दहशत

 

मणि बेन द्विवेदी

ग़म का आलम नगर शहर में

क़ैद सभी है अपने घर में


सूनी गालियां सूनी सड़कें

दहशत है हर ओर खबर में


वक्त बड़ा अनमोल हुआ अब

साथ तो देना कभी सफ़र में


चन्द। पलों का है ये जीवन

खुशियां ले कर चलो सफ़र में



भूला के रंजिश भुला अदवत

क्या रक्खा है। अगर मगर में


पार लगाओ हे बनवारी

फंसी है कश्ती मेरी भंवर में।


कैसे बीती उम्र ये अपनी

 तेरी। यादों के मंज़र में


खौफ का कैसा आलम पसरा

क़ैद सभी है अपने घर में


वक्त रोके ठहरी हूं अब तक

मिलोगे शायद कभी सफ़र में


सारे ज़ख़्म दिखाऊंगी मैं

कह दूंगी सब नजर नज़र में


मौत का दहशत ऐसा पसरा

मौत ही दिखता हर मंज़र में

मणि बेन द्विवेदी

वाराणसी उत्तर प्रदेश

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