कवि जितेन्द्र'कबीर' की रचनाएं


अंधेरे का मनोवैज्ञानिक असर


रात के अंधेरे में अकेले

डरे हुए मन से देखते हैं हम

जब पेड़-पौधों और झाड़ियों को,

तो पाते हैं उन्हें

आकार में धीरे-धीरे बढ़ते हुए,

जबकि दिन के उजाले में

नहीं होता ऐसा दृष्टि भ्रम,


रात के अंधेरे में उनका आकार बढ़ते जाना

दरअसल अनारक्षित वातावरण में

हमारे डर का उत्तरोत्तर बढ़ते जाना है।


रात के अंधेरे में अकेले

चलते हुए राह में कभी

चौंक जाते हैं हम एकदम

झाड़ियों में हो रही हल्की सरसराहट से भी

और देखते हैं वहीं बार-बार,

जबकि दिन के उजाले में

जाता नहीं हमारा ध्यान भी ज्यादा

ऐसी आवाजों की तरफ,


रात के अंधेरे में हमारा इस तरह डर कर 

चौंक जाना

दरअसल अचानक हमले की आशंका से

हमारी रक्षा प्रणाली का सक्रिय हो जाना है।


रात के अंधेरे में अकेले

देखकर किसी प्रियजन को

बीमारी से जूझते हुए,

उड़ जाती है हमारी नींद पूरी तरह से और 

तरह तरह की बुरी आशंकाओं से 

डूबने लगता है हमारा मन,

जबकि दिन के उजाले में

बुरी परिस्थितियों से जूझने का होता है

फिर भी हममें थोड़ा हौसला व विश्वास,


हमारी मानसिकता में रात और दिन में

यह बदलाव

दरअसल हमारे मन पर अंधेरे और उजाले का

मनोवैज्ञानिक असर होते जाना है।



अपने अपने स्वार्थ


सबके अपने-अपने स्वार्थ हैं,

मेरे, आपके और सारी दुनिया के,


बस उनको नाम अलग-अलग

दे दिये हैं हमनें,


धन-दौलत, पद, सत्ता,

मोह, लालसा और वासना को

कह लेते हैं हम स्वार्थ

जबकि

दान-पुण्य, सेवा, भक्ति, मोक्ष को

माना गया है परमार्थ,


गहरे अर्थों में.....


ईश्वर की भक्ति के

फलस्वरूप अपनी आत्मा की

भवसागर से मुक्ति की

कामना भी स्वार्थ है 

और

अच्छे कर्म करके स्वर्ग की

कामना करना भी स्वार्थ ही है,


किसी की सेवा करके अपना

परलोक सुधारने की

इच्छा रखना भी स्वार्थ है

और

किसी का भला करके प्रसिद्धि

पाने का उपक्रम भी स्वार्थ ही है,


अपने बाहुबल का सब जगह

लोहा मनवाना भी स्वार्थ है

और

अपनी विद्वत्ता के प्रर्दशन से

सब जगह अपनी

धाक जमाना भी स्वार्थ ही है,


बच्चों का लालन-पालन कर

अपनी वंश वृद्धि की कामना

भी है एक तरह से स्वार्थ,

और 

बुढ़ापे में अपनी देखभाल की

उनसे उम्मीद भी है

एक तरह से स्वार्थ ही,


हमारे लगभग सारे कर्म 

जाने-अनजाने में होते हैं

किसी ना किसी स्वार्थ से प्रेरित,


किसी के लिए भी 

बिल्कुल निस्वार्थ होकर जीना 

इस दुनिया में है 

एक बहुत ही मुश्किल काम।


                        

 गलतियों का अफ़साना


समझी जाती है बहादुरी आजकल

अपनी गलती के स्पष्टीकरण में

सामने वाले की गलतियां गिनाना,

अपनी गलतियों को स्वीकार करने का कलेजा

अब रखता नहीं है जमाना।


समझा जाता है कुशल प्रबंधन आजकल

अपनी गलतियों को दबाए रखने का

किसी भी कीमत पर जुगाड़ भिड़ाना,

बहुत बार तो उनको उपलब्धियों की तरह

प्रचारित अब करता है जमाना।


समझा जाता है बहुत जरूरी आजकल

दूसरों की गलतियों को

अपनी तरक्की के लिए भुनाना,

अपनी काबिलियत के दम पर सफल होने की

कूव्वत अब कम ही रखता है जमाना।


समझी जाती है बेइज्जती आजकल

अपनी गलतियों की माफी

सार्वजनिक तौर पर मांग जाना,

गलती मानकर उन्हें सुधारने की कोशिश

अब बहुत कम करता है जमाना।


                                         


कामकाजी महिलाएं


कामकाजी महिलाएं पिसती हैं प्रतिदिन 

घर की जिम्मेदारियों और नौकरी के बीच,


घर के कामों को 

समय से ना निपटा पाने के लिए

सुनती हैं ताने अक्सर,


नौकरी में भी हो जाती हैं‌ पैदा कई बार 

असहज स्थितियां,


घर- बाहर का दवाब दिखाता है अपना असर

शरीर और दिमाग दोनों पर,


बार-बार बीमार पड़ते शरीर और

 बेचैन थके दिमाग के साथ 

वो कोशिश करती हैं भरपूर

किसी तरह 'पूरा' पड़ने की

मगर नहीं होती ज्यादातर कामयाब,


स्वयं को 'मार्डन' दिखाने वाले घरवाले,

उसकी कमाई पर तो रखते हैं 

पूरा अधिकार 

लेकिन नहीं बनते बहुधा

उसके रोज के संघर्ष के हिस्सेदार,


औरत के प्रति उनकी

उदारवादी सोच

सीमित होती है सिर्फ पैसे घर आने

के लालच तक,


नौकरी करके

थोड़ी सी आर्थिक आजादी की

उम्मीद रखने वाली महिलाएं

अक्सर वंचित रहती हैं

अपने खाते के एटीएम कार्ड से भी,

जबकि उनकी कमाई से

बहुत बार दुनिया को अपनी शान 

दिखाते हैं उनके घरवाले।


                          

 होगी मेरी खुशनसीबी


यह होगी मेरी खुशनसीबी 

कि तेरे ख्यालों में हो जगह

मेरी भी थोड़ी सी कहीं,

मेरे ख्यालों की बात और है,

उनकी तो रानी हो तुम्हीं।


यह होगी मेरी खुशनसीबी

कि तेरे अरमानों में हो जगह

मेरी भी थोड़ी सी कहीं,

मेरे अरमानों की बात और है,

उनकी तो रवानी हो तुम्हीं।


यह होगी मेरी खुशनसीबी

कि तेरी खुशियों में हो जगह

मेरी भी थोड़ी सी कहीं,

मेरी खुशियों की बात और है,

उनकी तो कहानी हो तुम्हीं।


यह होगी मेरी खुशनसीबी

कि तेरी जिंदगी में हो जगह

मेरी भी थोड़ी सी कहीं,

मेरी जिंदगी की बात और है,

उसकी तो जवानी हो तुम्हीं।


                 जितेन्द्र 'कबीर'


 गांव नगोड़ी डाक घर साच तहसील व जिला चम्बा हिमाचल प्रदेश

संपर्क सूत्र - 7018558314

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