कवि वीरेंद्र सागर की रचनाएं

 


इस पंछी को रुलाकर ना जाओ

दिल के पिंजरे में कैद कर ,

इस पंछी को रुलाकर ना जाओ ||


बिरहा की रातें बन जाएं साथी मेरी, 

इस तरह तुम मुझे सुलाकर ना जाओ ||


थामा है तुमने दामन ये मेरा, 

मुझसे अब हाथ छुड़ाकर ना जाओ ||


अग्नि के सात फेरों में बंधे हैं हम, 

इन सात वचनों को तुम भुलाकर ना जाओ ||


 झूठे हैं लोग और झूठी बस्ती है यहां

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चाहत हुस्न की है और प्रेम जबरदस्ती है यहां,

मोहब्बत की आड़ में नफरत भरी मस्ती है यहां ||


झूठे हैं लोग और झूठी बस्ती है यहां ||


पेश आते हैं ऐसे जैसे इनका दिल बहुत साफ है, 

बनावटी चेहरे हैं और बनावटी लोगों की हस्ती है यहां ||


झूठे हैं लोग और झूठी बस्ती है यहां ||


जाल इतने प्यार से फेंकते हैं मछुआरे जिसमें, 

मासूम और भोली मछली फसती है यहां || 


झूठे हैं लोग और झूठी बस्ती है यहां ||


नोच खाते हैं लोग उसे इस कदर, 

लोगों में सिर्फ हवस ही बसती है यहां ||


झूठे हैं लोग और झूठी बस्ती है यहां ||


तड़पता छोड़ देते हैं रास्ते पर उसे,

अब तो तन्हाई भी उसे डसती है यहां||


झूठे हैं लोग और झूठी बस्ती है यहां ||


मार देते हैं लोग सच को पैसे के लिए, 

झूठ महंगा है और सच्चाई सस्ती है यहां ||


झूठे हैं लोग और झूठी बस्ती है यहां ||


कयामत ने छीन लिया उससे रूप रंग उसका, 

अब उसे देख ये दुनिया हंसती है यहां ||


झूठे हैं लोग और झूठी बस्ती है यहां ||


यह मंजर देख दिल दहल गया #सागर का,

मंजिल दूर है और टूटी कश्ती है यहाँ ||


झूठे हैं लोग और झूठी बस्ती है यहां ||


- वीरेंद्र सागर 

- शिवपुरी मध्य प्रदेश

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