तुम इंतजार ज़रूर करना

तुम इंतजार ज़रूर करना,उगते सूरज की आस तुम ज़रूर करना।।

निराश हो? बेचैन हो?या बेख्वाब हो?, कस्मकस घड़ी के गुज़र जाने की तालाश में ज़रूर रहना।

घिरे अंधेरे के कोहरे से उस चांद को देखने की हलक तुम ज़रूर रखना,

तुम इंतजार ज़रूर करना उगते सूरज की आस तुम ज़रूर करना।

उस भरे पतझड़ के मौसम में भी वसंत की आस तुम ज़रूर रखना,

आज गिरे पत्तों को देखकर ही सही, पेड़ पर खिले फूलों की चाह ज़रूर रखना।

तुम इंतजार ज़रूर करना उगते सूरज की आस तुम ज़रूर करना।

चाहे छिप जाए वह सूरज किसी कोने में पर थमकर एक दफा और सोचना,

इंतजार में आस और आस में इंतजार ज़रूर करना।

तुम इंतजार ज़रूर करना उगते सूरज की आस तुम ज़रूर करना।।।


इस पल को जी लिजिए

यह कोरोनावायरस का समय बार-बार नहीं आएगा,

ना चेहरे पर मास्क के साथ वाली पिक्चर होगी और ना ही प्रिकौशन बताने वाला कौलरट्यून होगा।

फिर चले जाएंगे सब अपनी-अपनी राह पर,

ना परिवार के साथ दिन बितेगा और ना ही दोस्तों के साथ घंटों की बातें होंगी।

वह ओनलाइन कक्षाओं में देखे हुए चेहरे भी अनजान हो जाएंगे,

ना नेटवर्क का बहाना होगा और ना ही यह अफसाना होगा।

यह पल एक सदी का इतिहास बन जाएगा,

इस पल के गुज़र जाने का इंतजार भी कट जाएगा।

फिर बिना मास्क लगाए गए हंसते हुए चेहरे सामने आएंगे,

ना किसी से मिलने की चाह होगी और कभी हमें इसी पल की याद आएगी पर यह बीत चुका होगा।

अरे जनाब! जी लिजिए इस पल को कौन जाने यह पल भर की तनहाई जिन्दगी भर की हो जाए,

ना गुज़रे हम कभी इस दौर से,

मान लीजिए कहीं यह पल हमें ही ना समेट ले जाए ।

हमें ही ना समेट ले जाए।।।।

- दीपिका चौहान

छत्तीसगढ़।

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