ऐसा तूझ में क्या हैं माँ


कवि मुकेश गौतम 

जो सबको सुलाकर सोती है सबसे पहले उठ जाती है।

सारा घर सोया रहता है वह कामों में जुट जाती हैं।।

थककर भी कभी नहीं थकती जो ममता में बट जाती है।

ऐसा तुझमे क्या है माँ जहाँ हर पीड़ा मिट जाती है।।1।।


जिसके मन मंदिर में निशदिन नेह का दीपक जलता है।

जिसकी ममता के साये में नेह का दीपक जलता है।।

जिसकी छाया तले सदा हर दिन ही सूरज ढलता है।

ऐसा तुझमे क्या है माँ बिन तेरे सब कुछ खलता है।।2।।


तुम अपनों में बट जाती हो अपना सब कुछ देकर के।

तुम कष्ट मेटती आई हो सारे कष्टों को सहकर के।।

तुम हमें सींचती आयीं हो पावन गंगा सी बहकर के।

ऐसा तुझमे क्या है माँ कहती नहीं सब कुछ सुनकर के।।3।।


तू बनी प्रेरणा जीवन में तुझ से ही पहला पाठ पढ़ा।

तेरे संभल से प्रेरित हो कितनों ने ही इतिहास गढा।।

मैं नमन करूँ उस हर माँ को ये जीवन उसकी रचना है।

सच में तुझमे सब है माँ तुझ संग जीवन भर हँसना हैं।।4।।

 

                     -कवि मुकेश गौतम 

                       डपटा,बूंदी (राज)

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