कागज के टुकड़े

 


सुशील कुमार भोला    

बहुत सताते थे वह कागज के टुकड़े, 

क्या क्या नहीं जलाते थे वह कागज के टुकड़े ।।


भविष्य के सपने कर गए थे चकनाचूर, 

तेरे हाथों के लिखे शब्द बने थे नासूर ।।


करूँ भी याद क्या तू बता क्या याद करूँ, 

वह झरनों की बातें थीं अब वारिश से डरूँ।।


खाक हो फिर जन्मा फिर फिर जलने के लिए, 

तेरे खत जले तो जले खाक होने के लिए।।


कभी आग कभी जल बना और कभी हवा हो गया, 

तेरी यादों का सिलसिला मुझे क्या क्या बना गया ...


🌹सुशील कुमार भोला       

                        जम्मू

Popular posts
सफेद दूब-
Image
भोजपुरी भाषा अउर साहित्य के मनीषि बिमलेन्दु पाण्डेय जी के जन्मदिन के बहुते बधाई अउर शुभकामना
Image
गीता सार
भिण्ड में रेत माफियाओं के सहारे चुनाव जीतने की उम्मीद ?
Image
सफलता क्या है ?
Image