ग़ज़ल

मणि बेन द्विवेदी

चाहत के उनके ख़्वाब आँखों में सजा लिए,

बुझते हुए चराग़ को फिर से जला लिए!!

-वादा किया था आएँगे मह्फ़िल में आपके,

हर दर्द लबों पे सजा के गीत गा लिए!!

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गुज़रा है अज़ब दौर से रिश्तों का ये सफर,

हर शख़्स जी रहा है दिल में फांसला लिए !!

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लहज़ा सुना जब ग़ैर सा तो होश उड़ गए,

चाहत में जिसके जिंदगी हमने मिटा लिए.!!

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कह कर गए थे आएँगे वफ़ा निभाने को,

क़ासिद न आया थक गए हम राह ताकते!!

-

 ये उठ रहीं लपटें कहाँ क्यों है धुंआ धुंआ,

सुना है बेवफ़ा का ख़त उसने जला दिए !

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वो जब चले थे मुस्कुरा के दिल चुरा मेरा,

पूछा था जब सवाल तो नज़रें झुंका लिए!!

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चले थे साथ ले कर मुहब्बत का कारवां,

रस्ता अलग सनम वो अपना बना लिए!!

# मणि बेन द्विवेदी

वाराणसी उत्तर प्रदेश

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