नियति

.           

   डॉ मधुबाला सिन्हा

"जब से आहट मिली तेरे आवन की

दिल कहाँ-कहाँ भटक यह आता है

कुछ कही कुछ अनकही बातें सब 

खुद से ही तो बतिया आता है


छुप-छुप कर कभी सामने आ जाता

कभी सामने आने से घबड़ा जाता है

मन बावरे धीर धरो यह

पगला मुझको ही समझा जाता है


चारो तरफ लगे पहरे हैं

उनको क्या बतलाऊंगी 

ना उनकी कुछ सुन पाऊँगी

ना अपनी ही तो सुना पाऊँगी


मौन अधर कम्पन कर थकेंगे

उनको मैं कैसे मनाऊँगी

जब पगला दिल यह समझ सके ना

अधरों को कैसे समझाऊँगी


लिखना चाहूँ मन की व्यथा पर

लिख नहीं मैं कुछ पाउँगी

जल रही थी विरह में कब से

मिलकर भी न अगन बुझाऊँगी


ऐ बैरन परदेशी पिया तू 

कब तलक मुझे तड़पायेगा

पास रहक़र दूर रहो क्या

नियति यह खेल खेलायेगा ?

    ★★★★★★

डॉ मधुबाला सिन्हा

मोतिहारी,चम्पारण

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