कवि कमलाकर त्रिपाठी की रचनाएं



 उत्कोच

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मानवधर्म नहीं है उत्कोच,

इसे जीवनमें न अपनाएं,

सेवा - सत्कर्म करें निःस्वार्थ, 

औ मानवता का मान बढ़ाएं,

मानवता का मान बढ़ाएं, 

लेकर उत्कोच न करें अधर्म, 

कहते 'कमलाकर' हैं विधि में, 

उत्कोच नहीं है मानवधर्म।। 


निशब्द

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निशब्द - निसंग रहकर मन में, 

नित करें प्रभु का ध्यान, 

जगमग-जगमग ज्योति जगेगी,

औ मिट जायेगा अघ - अज्ञान,

मिट जायेगा अघ - अज्ञान,

करें जप - जाप रहकर निशब्द, 

कहते 'कमलाकर' हैं ध्यान में, 

रहें सदा नीरव - निशब्द।।


बंधन

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बंधन न तो है सांसारिकता में,

औ न है सुख - वैभव में बंधन,

बंधन यदि है कहीं जगत में, 

तो वो है अटूट प्यार का बंधन, 

वो है अटूट प्यार का बंधन,

है प्यार में होता कितना क्रंदन, 

कहते 'कमलाकर' हैं फिर भी, 

अनमोल है प्यार का बंधन।। 

 

सेवा

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तन की सेवा, मन की सेवा,

नित जन की सेवा कीजिए,

औ सेवा ही है धर्म - कर्म,

सदा शुभलाभ लीजिए,

सदा शुभलाभ लीजिए,

कभी व्यर्थ न जाये ये जीवन,

कहते 'कमलाकर' हैं सेवा से,

सुखी-हर्षित रहता मन-तन।।

     

कवि कमलाकर त्रिपाठी.

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