कवि उदय किशाेर साह की रचनाएं



उदय किशोर साह


कुदरत की सजा 

 

कुदरत क्यों बना हैवान है

मानव के लिये नहीं मेहरबान है

आँधी तुफान और दी जलजला

महामारी की है दी ये सजा


कुदरत क्यों बना हैवान है

गुस्से में क्यों ये जहान है

जरूर हुई है मानव से खता

जो दे रही है मानव को सजा


कुदरत क्यों बना हैवान है

करनी की सजा की फरमान है

इन्सान ने की है कुदरत से दगा

पा रहा है मानव इसकी अब सजा


कुदरत क्यों बना हैवान है

चारों ओर भय दहशत का विहान है

कुदरत से छेड़खानी की पा रहा है मजा

कुदरत ने दी बेवफाई की सजा


कुदरत क्यों बना हैवान है

कुदरत से मानव आज परेशान है

कुदरत से टकराने की की थी जुर्रत

आज मानव को मिली सोंचने की फुरसत


मत लो पंगा कुदरत से जनाब

चलने दो इन्हें अपने अंदाज

ना कर कुदरत से कोई दगा

माफी मांगों कुदरत से सखा


 टुटे दिल 


एक दिन छोड़ कर चला जाऊँगा

तेरा ये पत्थर का शहर

उस दिन तुम ऑसू बहायेगी

ना दर्द सुनेगा जालिम ये नगर


एक दिन छोड़ कर चला जाऊँगा

तेरा ये गाँव की डगर

उस दिन बहुत पछतायेगी

मुड़कर ना देखूँगा तेरा ये घर


एक दिन छोड़ कर चला जाऊँगा

तेरी ये नफरत सी नजर

उस दिन पश्चाताप करेगी

लौट कर ना आऊँगा तेरा ये दर पर


एक दिन छोड़ कर चला जाऊँगा

भले भटकता रहूँगा दर बदर

मेरे लिये इक दिन रोयेगी

और रोयेगा मेरा प्रेम नगर


एक दिन छोड़ कर चला जाऊँगा

सूनी रह जायेगी रंग महल

सारे दरवाजे बंद मिलेगें

वीरान सा होगा तेरा रंग महल।


उदय किशोर साह

मो० पो० जयपुर जिला बाँका बिहार

9546115088

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