कवि डॉ अनुज कुमार चौहान "अनुज" की रचनाएं

 


 " यादों ने मर्यादा तोड़ी,पहरा घना बिठाया है "

            ( गीत )

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यादों ने मर्यादा तोड़ी,पहरा घना बिठाया है ।

फटे -पुराने कागज पलटे,नजर अँधेरा छाया है ।।

आसमान में खिले सितारे, जुगनूँ दर्पण ले बोले ।

चलो नाव में बैठ किनारे,हम पहुचायें घर गोले ।।

मासूमों को समझ सके ना,इधर-उधर मन भाया है ।

यादों ने मर्यादा तोड़ी,पहरा घना बिठाया है ।।

कभी महल से ना उलझें हम,सीख सिखाते खेत जहाँ ।

माटी की छाती ममता का,भेद दिखे संकेत यहाँ ।।

लाभ विवश पर बड़े सयाने,सब रीतों की माया है ।

यादों ने मर्यादा तोड़ी,पहरा घना बिठाया है ।।

आग उगलती रवि-रश्मियाँ,सागर की लहरें सहमी ।

सभी खजाने लिये नजाकत,चूल्हों की डगरें बहमी ।।

पथिक बने हैं रथी सारथी ,मन उलझत भ्रम काया है ।

यादों ने मर्यादा तोड़ी,पहरा घना बिठाया है ।।

इतराता इठलाता सपना , तड़प हकीकत क्या ? जाने ।

बेवश कहीं शिकायत रोती,शब्द फजीहत क्या ? जाने ।।

जीवन-प्रीति अनुज नहिं भाये,बेशक जीना आया है ।

यादों ने मर्यादा तोड़ी ,पहरा घना बिठाया है ।।


 गीत --"चाहतों के घोंसलों में चाहतें दिखती नहीं "

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राहतों का शोर घर-घर,राहतें दिखती नहीं ।

चाहतों के घोंसलों में ,चाहतें दिखती नहीं ।।

तर्क भी असफल हुए जब,बेवजह बदनाम थे ।

हम हकीकत की दलीलें,ले खड़े शरेआम थे ।।

भोर बीता रात की गति,लागतें दिखती नहीं ।

चाहतों के घोंसलों में,चाहतें दिखती नहीं ।।

भूख रोटी माँगती पर,माँगना सीखा नहीं ।

जो अँधेरों को मिटा दे,दीप भी दीखा नहीं ।।

कीमती हैं राज सारे ,आफतें दिखती नहीं ।

चाहतों के घोंसलों में ,चाहतें दिखती नहीं ।।

थे पुराने राग वंचित,हम उन्हीं में खो गये ।

रोशनी के भाव लेकर ,खँडहरों में सो गये ।।

रो गईँ दिनकर की आँखे, ताकतें दिखती नहीं ।

चाहतों के घोंसलों में,चाहतें दिखती नहीं ।।

धैर्य जीवन यज्ञ है ,वट-वृक्ष छाया ना मिले ।

बेसहारों की गली ,खुशियों की काया ना मिले ।।

गीत लिख दो अब "अनुज"तुम,आयतें दिखती नहीं ।

चाहतों के घोंसलों में ,चाहतें दिखती नहीं ।।

डॉ अनुज कुमार चौहान "अनुज"

अलीगढ़ , उत्तर प्रदेश ।

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