ज़िंदगी जंग है उसे हौसलों से हराओ नशे से नहीं

भावना ठाकर 'भावु '

आख़िर इंसान क्यूँ लत लगा लेता है किसी भी नशे की, जब किसी व्यसनी को पूछोगे की आख़िर क्यूँ करते हो नशा तो यही जवाब मिलेगा की टेंशन कितना है, चंद पलों का नशा करने से क्या सचमुच अवसाद से उभर जाते हो? या मुश्किलें ख़त्म हो जाती है। नहीं...व्यसन सिर्फ़ और सिर्फ़ तन मन और धन की बर्बादी के सिवाय और कुछ नहीं।

शराब, सिगरेट, चरस, गांजा, कोकीन या गुटखा नशा जिस चीज़ का भी हो खतरनाक और जानलेवा ही होता है। आजकल की पीढ़ी का एक वर्ग इन सारी चीज़ों का सेवन करते नशेड़ी होता जा रहा है। और तो और अब लड़कियां भी ऐसे नशे का शिकार होती जा रही है। बड़े शहरों में पब में बैठकर दारु और सिगरेट पीना जैसे फ़ैशन बन गया है।  कुतूहल से शुरू होने वाला ये नशा कब तलब बन जाता है पता ही नहीं चलता। और नशे की लत लगाने वाला खुद का दोस्त ही होता है। ले ले ज़रा सा चखने ले या ले न यार एक सुट्टा मारकर तो देख, बस शुरुआत यहीं से होती है। बड़ी-बड़ी पार्टियों में ये सारी चीज़े आम होती है और कोर ग्रुप का हिस्सा तभी बनाया जाता है जब ये सारी चीज़े अपनाओ। ना कहने पर खुद को सब नीचा और छोटी सोच वाला ना समझ ले ये सोचकर पीने पिलाने वाली रस्म निभाते व्यसनी बन जाते होंगे। जहाँ पैसा प्रसिद्धि ग्लैमर है वहाँ ड्रग एब्यूज़ और शारीरिक शोषण अपनी जगह बना ही लेता है। अब ये बदी धीरे-धीरे हर क्षेत्र में फैल रही है। जाने अन्जाने ये नशीले पदार्थ हमारी निज़ी ज़िंदगी में प्रवेश कर चुके है। ड्रग मतलब चरस गांजा हेरोइन या शराब ही नहीं शरीर के लिए हानिकारक तत्वों वाले कैमिकल घर-घर बसेरा करने लगा है। जैसे कफ़ सिरप, नींद की गोलियां, सिगारेट के साथ विड गांजा, चॉकलेट की तरह हर जगह उपलब्ध है। समाज को दीमक की तरह बर्बाद करने वाले ड्रग माफ़िया के आगे पुलिस और सरकार लाचार क्यूँ है ? क्यूँ उस पर ऊँगली उठाने वालों को अपनी ज़िंदगी से हाथ धोने पड़ रहे है। एनसीबी को सख्ती से काम लेकर कारवाई करनी होगी। ड्रग से जुड़ी हर कड़ी को बेनकाब करके समाज को इस बदी से उभारना चाहिए।

व्यसन सच में एक अभिशाप है, जो व्यसनी है किसी भी चीज़ का नशा उसको शारीरिक रूप से तो खोखला करता ही है, साथ में पैसों की बर्बादी अलग से। और टूटते परिवारों की तबाही का सबसे बड़ा कारण दारु का नशा होता है। दारु पीकर घर में झगड़ा करना पत्नी को पिटना गाली गलोच करना और बच्चों को मारना परिवार का सुख चैन छीन लेता है। पीने पर पति को टोकने से झगड़ा शुरू होता है और मारपीट तक पहुँच जाता है।

सवाल ये है की एसा क्या कारण है जो आज का युवा वर्ग अवसाद से घिरकर इन सब चीज़ों के प्रति आकर्षित होते अपनी करियर और ज़िंदगी को दांव पर लगा लेते है। 

मादक द्रव्यों के बढ़ते हुए प्रचलन के लिए आधुनिक सभ्यताओं को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। जिसमें व्यक्ति यांत्रिक जीवन व्यतीत करता हुआ भीड़ में इस कदर खो गया है कि उसे अपने परिवार के लोगों का भी ध्यान नहीं रहता है। नशा एक अभिशाप है, एक ऐसी बुराई जिससे इंसान का अनमोल जीवन मौत के आगोश में चला जाता है एवं उसका परिवार बिखर जाता है।

इन सबके पीछे घर के हालात, माँ-बाप से कन्वरसेशन की कमी, आर्थिक समस्या, सामाजिक बोझ जैसे बहुत से हालात भी शायद ज़िम्मेदार हो सकते है। पर कोई भी समस्या खुद की ज़िंदगी से बड़ी या अहम नहीं। क्यूँ नहीं समझते की जान है तो जहान है। नशा या खुदकशी समस्या का हल नहीं। ज़िंदगी जंग है लड़कर जितनी चाहिए ना की संघर्ष के आगे घुटने टेक कर खुद को बर्बाद कर लें।

(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)#भावु

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