ग़ज़ल


विद्या भूषण मिश्र

~~~~~~~~~~

बहुत अकेला हूॅं, पास आओ, जी नहीं लगता!

मुझे सुनो भी, कुछ सुनाओ, जी नहीं लगता!!

~~~

बिखर न जाऊॅं कहीं, डर यही सताता है;

यूॅं अकेले न छोड़ जाओ, जी नहीं लगता!!

~~~

ॳॅधेरी रात का मंज़र है, सब चराग़ हैं ग़ुल;

चराग़ फिर कोई जलाओ, जी नहीं लगता!!

~~~

तुम्हारे वास्ते जो गीत लिखे थे मैंने;

मेरे वो गीत गुनगुनाओ, जी नहीं लगता!!

~~~

न कोई शोर, न हलचल, न तमाशा कोई;

सभी पाबंदियाॅं हटाओ, जी नहीं लगता!!

~~~

*- विद्या भूषण मिश्र

, बलिया, उत्तरप्रदेश*

~~~~~~~~~~~

Popular posts
सफेद दूब-
Image
भोजपुरी भाषा अउर साहित्य के मनीषि बिमलेन्दु पाण्डेय जी के जन्मदिन के बहुते बधाई अउर शुभकामना
Image
गीता सार
भिण्ड में रेत माफियाओं के सहारे चुनाव जीतने की उम्मीद ?
Image
सफलता क्या है ?
Image