ग़ज़ल

'ऐनुल' बरौलवी

भूके सभी मज़दूर हैं , दे दे निवाला या ख़ुदा

वोटों की ख़ातिर ही इसे , सबने उछाला या ख़ुदा

कपड़ा बदन पर,सर पे छत ,इसको मयस्सर है नहीं

ये माँगता तुमसे नहीं , मस्जिद - शिवाला या ख़ुदा


रोटी के चक्कर में है निकला , गाँव से कोसों ये दूर

मुश्किल घड़ी में हो तुम्हीं इसके रखवाला या ख़ुदा


ये लाॅकडाउन में फँसा है , काम - धंधे बंद हैं

इसको मकाँ मालिक ने घर से है निकाला या ख़ुदा


चलती नहीं कोई सवारी , गाँव कैसे जाए ये

मज़बूर हो पैदल चला , हिम्मत सँभाला या ख़ुदा


हैं साथ में बीबी व बच्चे , सर पे है सामान भी

पैसा नहीं जब जेब को , इसने खँगाला या ख़ुदा


सरकार आँखें मूँदकर , सोई हुई है अब तलक

मज़बूर ओ मज़लूम के मुँह , भूके ताला या ख़ुदा


अब ज़िन्दगी ओ मौत में ,कुछ फ़ासला 'ऐनुल' नहीं

भूके नहीं अब ज़ीस्त का , निकले दिवाला या ख़ुदा


 'ऐनुल' बरौलवी

गोपालगंज (बिहार)

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