साहित्यकारा सुनीता जौहरी की रचनाएं


नारी


सुंदर नार नवेली सुसंस्कृति सज्जित 

रुप,गुण, सौंदर्य से देवता भी हर्षित


भव्य भावनात्मक भावुकता से भरी

सरल सहज सुमधुर सौम्यता धारती

शक्तिपुंज धूरी है अपने परिवार की

सुंदर नार नवेली सुसंस्कृति सज्जित ।।



नारीपूर्णा नारायणी श्रेष्ठ कृति ब्रह्मांड की

प्रेम दया के संग अपना जीवन संवारती

आत्मालय से सबका सम्मान है करती

गरिमा नारी की तुम तो प्यार से बढ़ाती

सुंदर नार नवेली सुसंस्कृति सज्जित ।।


अंखियन नीर छुपा शिशु दुलारती

तन मन सब कर अर्पित गर्भ संवारती

घर की दहलीज में महाभिनिष्क्रमण पाती

 ज्ञान भर अंजुलि में माथे पर टीका काढ़ती 

सुंदर नार नवेली सुसंस्कृति सज्जित ।।


 लघु कथा


बेबस मजदूर

चारों तरफ अजीब सा सन्नाटा छाया हुआ था उसी सन्नाटे में एक हाथ गाड़ी पर बूढ़ा मजदूर बाप अपने जवानी की दहलीज  पर कदम रख चुके बेटे को लेकर हांफता हुआ अस्पताल की तरह जा रहा था । उसकी आंखों में आशा और निराशा दोनों के आंसू छलक आए थे, वह जितनी जल्दी हो सके अपने बेटे को अस्पताल पहुंचाना चाहता था उसे अपनी परवाह नहीं थी। जर्जर काया पर तेजी इतनी कि युवा भी शर्मा जाए वह किसी तरह हांफते -हड़बड़ाते अस्पताल के गेट के पास पहुंचा और अपने बेटे को वहीं छोड़ अंदर डॉक्टर से अपने बेटे को देख लेने के लिए बुलाने चला गया ।

अंदर पर्चा लेकर जब डॉक्टर के पास पहुंचा तो डॉक्टर ने उसकी तरफ नजर उठाकर देखा, बूढ़ा मजदूर हाथ जोड़ें उसके सामने खड़ा था ।

उसे देखकर बोला,' इंतजार करो थोड़ा काम कर लूं फिर देख लूंगा ।'

' साहब एक बार देख लीजिए, बहुत बीमार है मेरा बेटा एक ही सहारा है माई- बाप हम पांव पड़ते हैं आप एक बार चलकर देख ले।'

' मैंने कहा ना, थोड़ा इंतजार करो कुछ काम है कर लूं फिर आता हूं ,देखता हूं ।'

तभी वहां शहर का एक बड़ा व्यापारी अपनी बीमार पत्नी को लेकर आता है ।

सारा काम छोड़ कर तुरंत डॉक्टर साहब उसकी पत्नी का इलाज शुरू कर देता है । सारे स्टाफ को  भी देखभाल करने के लिए बुला लेता है।

 उधर बूढ़ा बाप डॉक्टर का आसरा लगाएं कभी अपने बेटे के पास जाकर देखता तो कभी डॉक्टर के केबिन में आकर डॉक्टर को देखता  कि भगवान रुपी डॉक्टर आएगा और मेरे बेटे को बचा लेगा।

 एक घंटा बीत गया दो घंटा बीत गया अब उसके बेटे की सांसे भी थम चुकी थी। बूढ़ा मजदूर जार-जार रो रहा था उसका एकमात्र सहारा छिन गया था। वह बेसहारा हो गया था। उसकी लाचार, बेबस आंखों में उस दर्द की तड़प थी जो इस मौत को टाल सकते थे पर  मेरी गरीबी और डॉक्टर की संवेदनहीनता के कारण न टाल सका ।

 अपने बेटे को न बचा पाने का मलाल और इंसानियत को कोसता बेचारा बाप छाती पीट कर रोने के सिवा और क्या कर सकता था।

 शब्द

आज बिखरे से पन्नों पर कुछ शब्द 

मेरे हृदयांतल को स्पंदित कर रही


मानों मेरे ख्यालों में खिलने आ रही

या शायद एहसास से मिलने आ रही


हां !शब्द तो हर एहसास का मोती है

आज दिल की ज़मीन पर बिखर रही


 शब्द वह भाव है पास से गुजर रही

 क्या बतलाऊं क्या-क्या उकेरती रही


शब्द शैलियों में संजती संवरती गई

शब्द तो अपने में ही सार्थक होती रही


वह इतिहास के पन्नों में  बनती ,बिगड़ती

हंसती रोती गुनगुनाती अमोल बनती रही ।।

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सुनीता जौहरी

वाराणसी 

उत्तर प्रदेश

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