विचारों का टकराव

ओम प्रकाश श्रीवास्तव ओम

आओ हम सब मिल संस्कार सजाएं,

विचारों का फैला मतभेद इसे मिटाएं।

आज इस समाज अलगाववाद बढ़ रहा,

वाणी का कड़वापन सब पर है चढ़ रहा,

कोई दूसरे को समझने का प्रयास ना करता

सदा अपने को ही सही वह है समझता।



आओ हम सब मिल संस्कार सजाएं,

विचारों का फैला मतभेद इसे मिटाएं।


नई बहू घर अपना छोड़ के ससुराल जब आती,

विचारों की उथल-पुथल का समंदर है वह पाती,

सासें  कहें यह घर मेरा मेरा ही अधिकार,

बहू सोचे मैं आई इस घर मेरा भी है अधिकार,


आओ हम सब मिल संस्कार सजाएं,

विचारों का फैला मतभेद इसे मिटाएं।


अधिकारों की लड़ाई में संस्कार धूल खाते हैं,

शुरू होती है कलह विचार बहुत टकराते हैं,

इसी कलह में नित बच्चे जब हैं पलने लगते,

आपस में लड़ना ही  संस्कार समझने लगते,


आओ हम सब मिल संस्कार सजाएं,

विचारों का फैला मतभेद इसे मिटाएं।


कर प्रयास विचारों के मतभेद से हम बचते जाएं,

एक दूसरे का मान विचारों का सम्मान देते जाएं,

रहें खुश और रखें खुश अपने परिवार को

अपने बच्चों को अवसाद से हम सदा बचाएं।।


आओ हम सब मिल संस्कार सजाएं,

विचारों का फैला मतभेद इसे मिटाएं।


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