संवेदना और जीवन



डा रजनी रंजन

फोन की घंटी बजी 'ट्रिन ट्रिन ट्रिन'। आजकल फोन उठाने को जी नहीं करता। क्या पता! फिर कोई अपनी कोविड की बेबसी के किस्से सुनाये और अपेक्षा करे कि कोई उसकी मदद करे। घंटी रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। डरते हुए फोन उठाया।उधर से आवाज आई-भैयाऽऽ! ऊँहूहूहूऽऽ! ऊँहूहूहूऽऽ! पापाऽऽऽऽऽ। मोना ने किसी प्रकार कहा और फोन रख दिया।

     ओह! इनको भी अभी ही जाना था।हाॅस्पिटल में तो उनकी बेटी देख रही थी। इथर चाची भी तो पोजिटिव ही हैं! घर में तो डर से.......और अब घाट जाने के लिए.........? माथा पकड़कर बैठी श्रीमती जी का टेपरिकार्डर डर से चालू था।

         सोहन चुपचाप सोच रहा था क्या करे। पहले तो घर के सभी उत्सवों में पापा और चाचा एक साथ ही तो मनाते थे।पर ......इस कोविड ने तो संवेदना को ही मारने की ठान ली है। मन मारकर, दूर से ही तो हाॅस्पीटल में बीस दिनों से उनको देखकर आ जा रहा था। कभी किसी ने शिकायत नहीं की। आज भी मोना ने आने को न कहा। पर उसकी वेदना के तीन शब्द ही मर्म को बेध रहे थे। क्या अब अपनापन भी मर गया? कुछ न कह सकी बहना? ओह! दुख से मन भर आया।

          अचानक सोहन को चाचा के चेहरे में पिताजी की छवि दिखने लगी। याद आ गया उसे।उसके पिता जब बीमार थे तब वही चाचा दस दिनों तक छुट्टी लेकर इनलोगों के संबल बनकर खड़े थे। अचानक वह उठा और श्रीमती जी से बोला- जाओ एक ग्लास पानी गर्म करके लाओ और डबल मास्क दे दो। वह झटपट कपड़े पहन पानी पीया और श्रीमती जी के चेहरे की अनदेखी कर बाहर निकल गया। गाड़ी पर बैठकर सीधे हाँस्पीटल पहुँचा और बहन को घर भेजकर स्वयं अंतिम संस्कार करने चला गया।

     लौटकर आनेपर श्रीमती जी ने यों स्वागत किया जैसे सोहन मौत के मुँह से निकलकर आया है। स्नान , गरम पानी,सैनाटाइजिंग सब । शाम को चाय देते वक्त बोलीं- मेरी भी आँखें खुल गई हैं अब । अपने भी साथ नहीं देंगे तो दूसरे से क्या अपेक्षा हो। आपदा आई है तो चली भी जाएगी।

सोहन के साथ श्रीमती जी की भी आँखे नम हो गई थी।

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