निशा (घनाक्षरी)


निशा काली जब आती ,हसीं सपने दिखाती।

गम  को  जब   बुलाती, जरा  न नींद  आती।।

सजनी  सँवरती   है,  बिन   बात  लड़ती  है।।

रोज वो  झगड़ती   है , प्रीतम   को  न  भाती।।


निशा है  बड़ी दुलारी,चाँद को भी लगे प्यारी।

चाँदनी   से  खूब   यारी, ,झट   चमक जाती।।

बदली   चमकती   है,  भू    पर   बरसती  है।

बिजली  गरजती  है,  आफत  में  जां आती।।

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सुखविंद्र सिंह मनसीरत 

खेड़ी राओ वाली (कैथल)

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