दिनकर के बारे में मेरी कोई भी टिप्पणी सूर्य को दिया दिखाने के समान : अभिषेक मिश्र

 लोकप्रिय साहित्यकार डा•अभिषेक मिश्र  से भूपेन्द्र दीक्षित की अंतरंग बतकही



अभिषेक मिश्र साहित्यिक गलियारों में बेहद चर्चित नाम हैं।उनकी रचनाएं बहुत लोकप्रिय हैं।उनकी विनम्रता और बुद्धिमत्ता प्रभावित करती है। प्रस्तुत है छः राज्यों तक पहुंच बनाने वाल  दि ग्राम टुडे के सह संपादक भूपेन्द्र दीक्षित से उनका एक विशिष्ट साक्षात्कार।

भूपेन्द्र दीक्षित-अपनी साहित्यिक पृष्ठभूमि के बारे में बताएं।जन्म कब ,कहां हुआ?किन साहित्यकारों से प्रभावित हुए?किस कृति का प्रभाव बहुत पड़ा? माता-पिता,पत्नी आदि के बारे में संक्षिप्त परिचय।शिक्षा दीक्षा ,कार्य आदि पर प्रकाश डालें।


अभिषेक मिश्र- मैं 25 जुलाई 1987 को अपने ननिहाल में पैदा हुआ था । मेरा ननिहाल बिहार के बेगूसराय जिला में अवस्थित वासुदेवपुर चांदपुरा गाँव है जबकि घर इसी जिले में स्थित सदानंदपुर नामक गाँव है । जब मैं पैदा हुआ तो बचपन जमींदारी के हनक में जिया । तकरीबन दस साल तक ननिहाल में रहा उसके बाद अपने गाँव आया । गाँव आने के पश्चात पापा प्रत्येक महीने मुझे नंदन , चंपक , बाल हंस , नन्हे - सम्राट जैसी बाल पत्रिकाएं लाकर देते थे । जिसने मैं काफी तन्मयता से पढ़ता था । इस तरह से बचपन से ही पढ़ाई - लिखाई के माहौल के बीच रहा हूँ । दादा - दादी मध्यविद्यालय में हेडमास्टर थे । पापा - मम्मी , चाचा - चाची , नानाजी , मामाजी सभी उच्च शिक्षित हैं । पापा को भी पढ़ने - लिखने की लत है जिसके कारण घर लाइब्रेरी बना मिला । पापा - मम्मी भी कविताएं लिखते हैं , इस कारण मुझे लगता है कि पढ़ने - लिखने की आदत वंशानुगत ही है । मम्मी पापा बताते हैं कि मैं बचपन से ही एकांकी और गंभीर प्रकृति का था और कुछ ना कुछ सोचते रहता था । घर के साहित्यिक माहौल और इन पत्रिकाओं के असर से मैं अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति देने लगा और पहली कविता सातवीं क्लास में लिखा उसमें भी एक लड़की जो कि मेरे साथ ही पढ़ती थी उसके प्रति अपनी भावना को अभिव्यक्ति दी थी । मगर अफसोस कि उस लड़की से मैं कभी अपनी भावना साझा नहीं सका । उसके बाद तो लिखने का सिलसिला कुछ यूँ चला कि आज तक लिख रहा हूँ । 

        हिंदी की पढ़ाई बचपन से अच्छी लगती थी । जहाँ तक मुझे याद है मैं सबसे पहले सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता " झाँसी की रानी " से प्रभावित हुआ था । मेरे पसंदीदा साहित्यकार नागार्जुन , अज्ञेय , मुक्तिबोध , हरिशंकर परसाई और रामकुमार वर्मा हैं । सबसे अधिक नागार्जुन से प्रभावित हुआ हूँ । नागार्जुन पर मैंने रिसर्च भी किया है जो कि जल्द ही एक पुस्तक " पीडोफिलिक नागार्जुन :: विवादों और साजिशों के बीच " के रूप में प्रकाशित होने वाली है । 

         मेरे पिताजी का नाम डॉ सतीश चंद्र मिश्रा है जबकि माताजी का नाम डॉ इंदु मिश्रा है । माँ और पिताजी दोनों होमियोपैथीक डॉक्टर हैं । मैंने मेडिकल साइंस से पीजी तक कि पढ़ाई की है । वर्तमान में नेत्र रोग विशेषज्ञ होने के साथ - साथ हिंदी साहित्य का विद्यार्थि भी हूँ । मेरी पत्नी का नाम डॉ श्वेता कुमारी है जो कि दंत रोग विशेषज्ञ है । मेरी बहन भानु प्रिया अभी मेडिकल इंटर्न है ।

भूपेन्द्र दीक्षित--डा•साहब,आप किनकिन संस्थाओं से जुड़े?कब? वर्तमान में किससे जुड़े हैं?


 अभिषेक मिश्र -मैं खुद को प्रगतिवादी साहित्यकार मानता हूँ इसलिए प्रारंभ से ही प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ा रहा हूँ । वर्ष 2018 में मुझे प्रलेस के कार्यसमिति में भी जगह दी गयी । प्रलेस के भीतर पनपे साहित्यिक गुटबाजी , मठाधीशी और गैर लेखकों के संगठन के भीतर घुसपैठ से खिन्न होकर वर्तमान में मैं संगठन के प्रति उदासीन हूँ । प्रलेस एक लेखक संघ से अधिक राजनीतिक संगठन में परिणत हो चुका है । बेगूसराय की एक स्थानीय संस्था " नव साहित्य सर्जना परिषद " जिसके संस्थापक शेखर सावंत जी हैं से भी जुड़ा हूँ ।

भूपेन्द्र दीक्षित-अपनी साहित्यिक संस्था का इतिहास बताएं।

अभिषेक मिश्र-सर, प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना 1936 में लखनऊ में हुई जिसकी अध्यक्षता मुंशी प्रेमचंद ने की थी। वर्ग चेतना और वर्ग संघर्ष की भावना की यथार्थ दृष्टि इस लेखक संघ के लिए प्रेरक तत्व थी लेकिन वर्तमान में यह भावना केवल भाजपा के विरोध और साहित्य में मठाधीशी स्तर के आडंबर तक सिमट गई है जो कि साहित्यिक के लिए हितकर नहीं है । वेतमान समय मे प्रगतिशीलता के झंडाबरदार बने कतिपय छद्म प्रगतिवादी प्रगतिशील साहित्य के उस इतिहास को भूल चुके हैं जिसके कारण यह एक साहित्यकीक आंदोलन बना । प्रगतिशील साहित्य , साहित्य में स्वस्थ सामाजिकता , व्यापक भावभूमि और उच्च विचार का धोतक है जो न केवल राजनीतिक जागरण से आरंभ होकर क्रमशः जीवन की व्यापक समस्याओं की ओर , आदर्शवाद से आरंभ होकर क्रमशः यथार्थवाद की ओर और यथार्थवाद से आरंभ होकर क्रमशः स्वस्थ सामाजिक यथार्थवाद की ओर आज भी अग्रसर है । लेकिन साहित्य की राजनीति करने वाले कतिपय प्रगतिशील वर्तमान में इन सारी बातों को भूलकर केवल भाजपा और मोदी विरोध की पैरोकारी करते नजर आते हैं जिससे इस लेखक संगठन की साख को बट्टा लगा है ।

भूपेन्द्र दीक्षित-डा•साहब! अपने जनपद की सांस्कृतिक , साहित्यिक धरोहर के विषय में बताएं।

अभिषेक मिश्र-सर, बेगूसराय के साहित्यिक धरोहर के रूप में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर , मुकुर जी , वचंदेव झा , आनंद नारायण शर्मा , अरुण प्रकाश , आदि रहे हैं । वर्तमान समय में राजेंद्र राजन , दीनानाथ सुमित्र , नीलमेंदु सागर , अशांत भोला , शेखर सावंत , महेश भारती , मुकुल लाल , एस मनोज , शतामनन्दन निशाकर , नरेंद्र कुमार सिंह , डॉ रामरेखा , आनंद रमन , रंजन कुमार झा , रूपम झा , प्रफुल्ल मिश्रा , रंजना सिंह , आनंद रमन , अनिल पतंग आदि अच्छे और स्तरीय साहित्य का सृजन कर रहे हैं । अर्चना रॉय और दिव्या श्री भी संश्लिष्ट नारीवादी विषयों पर काफी बेहतर लिख रही है ।

भूपेन्द्र दीक्षित-डा•साहब,अपने अब तक के कार्यों के बारे में बताएं?

अभिषेक मिश्र- सर,अभी तक मेरी चार पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है । प्रकाशित पुस्तकों में "रस्सा खोल" और "झुकती पलकों की चीख" काव्य संग्रह है , "साहित्यिक मठाधीशों का काला चिट्ठा" व्यंग्य , आलोचनात्कमक गद्ध्य आलेखों का संग्रह है जबकि " कोरोना डायरी : इंडिया फाइट्स अगेन्स्ट कोविड - 19 " में मैंने कोरोना से संबंधित रिसर्च , अपने अनुभवों और कोरोना काल में लिखे आलेखों और कविताओं को अभिव्यक्ति दी है । पांचवी किताब " पिडोफिलिक नागार्जुन : विवादों और साजिशों के बीच " अभी प्रेस में है ।

भूपेन्द्र दीक्षित-डाक्टर साहब!सामाजिक क्षेत्र में क्या क्या किया?

अभिषेक मिश्र-सर, मैं पेशे से चिकित्सक हूँ तो पीड़ित व्यक्ति की ईमानदारी से सेवा करने को अपना परम कर्म और धर्म मानता हूँ । समाज के किस भी व्यक्ति को कोई भी गलत सलाह देने से बचता हूँ । जब मेरे गाँव के हाईस्कूल में शिक्षकों की कमी थी तो कॉलेज की छुट्टियों में घर आने के बाद मैंने हाईस्कूल में पढ़ाने का कार्य भी किया है । अभी भी अगर कोई स्टूडेंट मेरे पास समस्या लेकर आता है तो मैं उसकी हर सम्भव मदद करने के लिए ततपर रहता हूँ । समाज के प्रत्येक वर्ग और जाति की सेवा बिना किसी भेदभाव के करता हूँ ।

भूपेन्द्र दीक्षित-आपकी दृष्टि में साहित्य क्या है?किन साहित्यकारों का साथ रहा? कोई उल्लेखनीय संस्मरण।

अभिषेक मिश्र-मेरी दृष्टि में साहित्य एक द्रव है , जिसका आयतन तो निश्चित है मगर आकार अनिश्चित है । कहने का अर्थ यह है कि साहित्य को आप जिस प्रकार के पात्र में उड़ेल दें साहित्य उसी पात्र की आकृति में ढल जाता है । अर्थात साहित्य को हम जिस नजरिये से देखते हैं उसी नजरिये से हम साहित्य को आत्मसात कर पाते हैं । यहाँ मैं यह कह रहा हूँ कि साहित्य का आयतन निश्चित है तो इसका अर्थ यह है कि चाहे साहित्य जिस भी प्रकार का हो वो साहित्य निश्चित रूप से हमारे समाज में घटित घटनाओं / परिकल्पनाओं / पूर्वानुमानों / नवोंनवेषीत सोच / निष्कर्ष / जागरण आदि पहलुओं के लिए दर्पण का कार्य करता है । 

         इसके अतिरिक्त साहित्य हमारे अंतर्मन के प्यास की तृप्ति भी है । तनाव , अवसाद , व्यवस्था के प्रति आक्रोश , परिवर्तन की छटपटाहट , दृश्य - शोषण , उन्माद , असहिष्णुता , अस्पृश्यता , वादाखिलाफी , संवेदना - सहानुभूति , प्रेम को समझने और परिभाषित करने की जिज्ञासा ,दुःसह परिकल्पना आदि से जब हमारा अंतर्मन छटपटाने लगता है तो इस छटपटाहट की तृप्ति का एकमात्र साधन साहित्य ही है ।

      समकालीन साहित्यकारों में विश्वनाथ त्रिपाठी , राजेश जोशी , आलोक धन्वा , नरेश सक्सेना , डॉ ब्रजमोहन सिंह , मनोज कुमार झा , राजेन्द्र राजन आदि का सानिध्य मिला । अवधि के मूर्धन्य साहित्यकार ज्ञानवती दीक्षित और भूपेंद्र दीक्षित के परिवार से खुद को अलग महसूस नहीं करता हूँ । जबकि स्थानीय साहित्यकारों में शेखर सावंत को मैं अपना साहित्यिक अभिभावक मानता हूँ जबकि दीनानाथ सुमित्र , अशांत भोला , महेश भारती आदि का प्यार मिलते रहता है ।

का साथ रहा? कोई उल्लेखनीय संस्मरण।

भूपेन्द्र दीक्षित-सीतापुर अवधी का गढ़ रहा है।संक्षेप में कुछ बताएं।


अभिषेक मिश्र-सीतापुर को पहले मैं भारत के पहले आई हॉस्पिटल के तौर पर जानता था, लेकिन ज्ञानवती दीक्षित और भूपेंद्र दीक्षित के सानिध्य में सीतापुर में अवधी के साहित्यिक विरासत और स्मृद्धि के बारे में जान पाया हूँ । सीतापुर से हूँ नहीं इसलिए विशेष क्या कहूँ ? सराहना कर सकता हूं कि अच्छा साहित्य रचा जा रहा है वहां।

भूपेन्द्र दीक्षित-अपने क्षेत्र के मूर्धन्य साहित्यकारों के विषय में बताएं।

अभिषेक मिश्र- मेरे क्षेत्र के मूर्धन्य साहित्यकारों में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर सर्वोच्च स्थान रखते हैं । दिनकर के बारे में मेरी कोई भी टिप्पणी सूर्य को दिया दिखाने के समान होगी । मुकुर जी के बारे में विशेष अध्ययन नहीं किया हूँ । आनंद नारायण शर्मा को बेगूसराय के वर्तमान साहित्यिक परिवेश के संरक्षक का दर्जा प्राप्त है । वचन देव झा व्याकरण के मूर्धन्य विद्वान थे ।

भूपेन्द्र दीक्षित-वर्तमान साहित्यकारों के विषय में बताएं।


 अभिषेक मिश्र- वर्तमान साहित्यकारों में दीनानाथ सुमित्र , अशांत भोला , राजेन्द्र राजन , अनिल पतंग , आनंद रमन , मुकुल लाल आदि पहली पंक्ति में खड़े हैं । ईनके बाद के जेनरेशन में शेखर सावंत , नरेंद्र सिंह , महेश भारती , रामा मौसम , रंजना सिंह , स्मिता श्री , रूपम झा आदि क्रियाशील हैं । जबकि मेरी पीढ़ी के साहित्यकारों में मनीष कुमार झा , अर्चना रॉय , दिव्या श्री , मणिभूषण सिंह आदि के अंदर असीम संभावनाएं दिखती है । 

भूपेन्द्र दीक्षित-अपनी कृतियों के विषय में कुछ बताएं।

अभिषेक मिश्र- चार प्रकाशित कृतियाँ - रस्सा खोल , झुकती पलकों की चीख , साहित्यिक मठाधीशों का काला चिट्ठा और कोरोना डायरी :: इंडिया फाइट्स अगेंस्ट कोविड - 19 .

भूपेन्द्र दीक्षित-डा •साहब,आपकी भविष्य की योजनाएं क्या हैं? वर्तमान साहित्यिक माहौल के विषय में क्या सोचते हैं?

नई पीढ़ी के लिए आपका क्या संदेश है?


अभिषेक मिश्र- सर,भविष्य की योजनाओं के बारे में क्या बताऊँ ? ईमान , सच्चाई और जनपक्षधरता के साथ सतत सृजनरत रहना चाहता हूँ ताकि खुद से नजरें मिला सकूँ। सिंहासन की कोई चाह है नहीं तो जो लिखता हूँ उसे दस्तावेज के रूप में संरक्षित करते रहना चाहता हूँ । 

      वर्तमान समय में साहित्य भी ग्लैमर की चकाचौंध से अछूता नहीं रहा । साहित्य पर भी ब्रांडिंग और मार्केटिंग का असर वृहत पैमाने पर दिखता है । साहित्य जिसमें भाषाई फूहड़ता , विकृत तथ्य , अश्लीलता , बनावटिपन समाई रहती है भी अच्छे ब्रांडिंग और मार्केटिंग के दम पर बेस्टसेलर की श्रेणी में आ जाती है । आज साहित्यकारों को साहित्य की इस स्थिति के बारे में भी गहराई से सोचना चाहिए और इन विकृतियों और विसंगतियों का सामाधान ढूंढना चाहिए और साहित्यिक मंचों को चुटकुला , द्विअर्थी संवाद तथा अश्लीलता से बचाने की कोशिश की जानी चाहिए ।नई पीढ़ी के साहित्यकारों को लिखते देख मन प्रफुल्लित हो उठता है । मैं नई पीढ़ी के साहित्यकारों से आग्रह करता हूँ कि वो जम कर लिखें , बिना किसी डर के लिखे लेकिन अपने कैरियर को स्थायित्व प्रदान करने का प्रयत्न भी करें । वर्तमान दौर में जब आप कैरियर में स्थायित्व प्राप्त करेंगे तभी आप पारिवारिक / सामाजिक / निजी और साहित्यिक जीवन में भी सफल कहला सकेंगे । याद रखें साहित्य के क्षेत्र में आपकी लेखनी ही आपकी पहचान बनेगी इसलिए मठाधीशों के चक्कर में नहीं पड़ें ।

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