श्री रामचरितमानस मानव विज्ञान और समाज शास्त्र की सरलतम औषधीय रचना है : प्रदीप तिवारी धवल




 लोकप्रिय साहित्यकार प्रदीप तिवारी जी से भूपेन्द्र दीक्षित की अंतरंग बतकही


प्रदीप तिवारी जी साहित्यिक गलियारों में चर्चित नाम हैं।उनकी रचनाएं लोकप्रिय हैं।उनकी विनम्रता प्रभावित करती है। प्रस्तुत है छः राज्यों तक पहुंच बनाने वाले दि ग्राम टुडे के सह संपादक भूपेन्द्र दीक्षित से उनका एक विशिष्ट साक्षात्कार।

 भूपेन्द्र दीक्षित- तिवारी जी, अपनी साहित्यिक पृष्ठभूमि के बारे में बताएं। जन्म कब ,कहां हुआ ? किन साहित्यकारों से प्रभावित हुए ? किस कृति का प्रभाव बहुत पड़ा ? माता-पिता,पत्नी आदि के बारे में संक्षिप्त परिचय। शिक्षा दीक्षा,कार्य आदि पर प्रकाश डालें ।

 

प्रदीप तिवारी धवल - भाई दीक्षित जी,

मेरा जन्म मार्च 1971 में साधारण कृषक परिवार में ग्राम-मिश्रौली, पोस्ट-जगदीशपुर, जनपद-अमेठी उ०प्र० में हुआ | पिता स्व० श्री रमेश दत्त तिवारी किसान और माता श्रीमती सोनपती तिवारी गृहणी हैं | सहधर्मिणी श्रीमती अमिता तिवारी समाजशास्त्र से परास्नातक हैं और गृहणी हैं, जिनका साहचर्य ही मुझे पूर्णता प्रदान करता है | दो पुत्र उत्कर्ष एवं उत्पल अध्ययनरत हैं | मेरी हाईस्कूल तक की शिक्षा गाँव में हुई | तत्पश्चात मैंने लखनऊ विश्वविद्यालय से 1994 में एम काम एवं 1996 में बी एड की शिक्षा प्राप्त की | मेरी अध्यापकीय अभिरुचि थी परन्तु कहते हैं जहाँ का दाना-पानी हो भाग्य वहीँ ले जाता है और मेरा चयन ssc द्वारा 1996 में भारत सरकार के सीमा शुल्क एवं केन्द्रीय उत्पाद शुल्क विभाग में हो गया | वर्तमान में मैं सीमा शुल्क मुख्यालय लखनऊ में निरीक्षक के रूप में पदस्थापित हूँ |

            साहित्य मेरा विषय कभी भी नहीं रहा, और न ही मेरी कोई भी साहित्यिक पृष्ठिभूमि थी | परन्तु इंटरमीडियेट से ही साहित्य ने मुझे प्रभावित करना शुरू कर दिया और मैं भी टूटे फूटे शब्दों में स्वान्तः सुखाय कभी कभी रचनाये करने लगा | ज्यादातर रचनाएँ सामाजिक विद्रूपताओं, असमानताओं, कुत्सित घटनाओं के प्रभाव से उत्पन्न हुई पीड़ा का परिणाम थी | साहित्यकारों में प्रेमचंद, प्रसाद, निराला, बच्चन, महादेवी वर्मा, धर्मवीर भारती, दुष्यंत कुमार, नीरज को ही थोडा बहुत पढ़ सका किन्तु इन्होने प्रभावित बहुत किया | बचपन से ही बाबा तुलसीदास रचित श्री रामचरितमानस ने बहुत आकर्षित किया और यहीं से अवधी के प्रति रुझान एवं झुकाव प्रारंभ हुआ| मानस को मैं आस्था से अलग, मानव विज्ञान और समाज शास्त्र की सरलतम औषधीय रचना मानता हूँ | जीवन के प्रत्येक असाध्य रोगों का इलाज इस महाकाव्य में समाहित है | मानस को पांच बार पढ़कर ख़त्म कर चुका हूँ परन्तु लगता है कि उसका लेशमात्र अंश नहीं जान सका हूँ | वैसे देखा जाए तो मेरा साहित्यिक अध्ययन नगण्य है, ये बात मैंने अपनी “मौन नहीं रह पाऊँगा” की भूमिका में भी बहुत विस्तार से लिखी है कि मेरी साहित्य की अकादमिक समझ शून्य है ।

|भूपेन्द्र दीक्षित -तिवारी जी,यह तो आपकी विनम्रता है।आप बताएं कि किनकिन संस्थाओं से जुड़े ? कब जुड़े? वर्तमान में किन संस्थाओं से जुड़े हैं?

 

प्रदीप तिवारी धवल - दीक्षित जी, 

शासकीय सेवा में रहने एवं विभिन्न स्थानों पर पदस्थापना के कारण मैं किसी भी साहित्यिक संस्था का बहुत सक्रिय सदस्य नहीं बन पाया | श्री विनोद मिश्र जी के अवधी विकास संस्थान, डॉ० राम बहादुर मिश्र जी के अवध भारती एवं श्री सर्वेश अस्थाना जी के सृजन संस्थाओं से लगभग दस वर्षों से आंशिक रूप से जुडा हुआ हूँ | जब भी सरकारी सेवा से समय निकाल सका इन संस्थाओं के कार्यक्रमों में सहभागिता की | अपनी स्वयं की संस्था के माध्यम से भी सामाजिक एवं साहित्यिक आयोजन आयोजित करता रहता हूँ |

भूपेन्द्र दीक्षित- तिवारी जी,अपनी साहित्यिक सेवा का इतिहास बताएं।

प्रदीप तिवारी-वस्तुतः शासकीय सेवा को ही मैंने मुख्य कर्म के रूप में सदैव चुना अब तक का साहित्यिक सफ़र स्वान्तः सुखाय एवं सर्विस से बचे हुए समय का सदुपयोग ही रहा है | इसीलिये साहित्यिक संस्थाओं, कवि सम्मेलनों, गोष्ठियों, सेमिनारों आदि में मेरी उपस्थिति एकदम नगण्य ही रही | लगभग बारह वर्ष पूर्व अवध ज्योति पत्रिका से जुड़ने के पश्चात अवधी में रूचि बढती गयी, किन्तु शासकीय व्यस्तताओं के कारण मैं अवध ज्योति पत्रिका एवं डॉ राम बहादुर मिश्र जी के अवधी मिशन को भी बहुत ही कम समय दे सका | इस क्षेत्र में किसी को गुरु नहीं बनाया, बैठकी नहीं की, संग संग साहित्यिक यात्रायें नहीं की, सम्मानों-प्रमाण पत्रों की दौड़ में नहीं रहा, इसलिए किसी एक साहित्यिक संस्था का नाम और उसका इतिहास नहीं बता सकता |

भूपेन्द्र दीक्षित- अपने जनपद की सांस्कृतिक , साहित्यिक धरोहर के विषय में बताएं ।

 

प्रदीप तिवारी धवल -      

अवधी के महाख्यान पद्मावत के रचयिता मलिक मुहम्मद जायसी की जन्मस्थली से हमारा गाँव मात्र तीस किमी दूर है | अमेठी साहित्यिक रूप से सदैव समृद्ध रहा है | अमर सुभाष खंड काव्य के रचयिता डॉ विनोद चन्द्र पाण्डेय ‘विनोद’ पूर्व निदेशक, उ० प्र० हिंदी संस्थान ने लगभग 70 पुस्तकों की रचना की और अमेठी का गौरव बढाया | अवधी के मूर्धन्य साहित्यकार श्री जगदीश पीयूष जी ने अवधी ग्रंथावली को दस खण्डों में प्रकाशित किया है | डॉ रामबहादुर मिश्र भी मूलतः अमेठी जनपद के ही निवासी हैं | उनकी अवध ज्योति पत्रिका अवधी का प्रचार प्रसार निरंतर पच्चीस वर्षों से कर रही है | वर्तमान में गौरीगंज के श्री मनोज ‘मुन्तजिर’ बालिवुड के अत्यंत जाने माने और लोकप्रिय गीतकार हैं | सांस्कृतिक धरोहरों में जायसी जी की मजार, नंदमहर धाम, पाटेश्वरी मंदिर और गढ़ामाफी धाम आदि दर्शनीय हैं | अमेठी पूर्व प्रधानमंती श्री राजीव गाँधी जी का संसदीय क्षेत्र रहा है परिणामस्वरूप इसका आद्योगिक विकास बहुत तीव्र हुआ है इस छोटे से जनपद में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त प्रमुख संस्थान हैं – HAL, BHEL, आयुध फैक्ट्री, राजीव गाँधी पेट्रोलियम प्रद्योगिक संस्थान, स्टील अथोरिटी ऑफ़ इण्डिया, फूटवियर डिज़ाइन एवं विकास संस्थान, उड़ान अकादमी एवं इन्डोगल्फ फर्टिलाज़र आदि प्रमुख रूप से हैं | अमेठी, मुसाफिरखाना, तिलोई गौरीगंज चार तहसीलों के इस जनपद का मुख्यालय गौरीगंज में स्थित है |

भूपेन्द्र दीक्षित-तिवारी जी, अपने अब तक के कार्यों के बारे में बताएं ?

 

प्रदीप तिवारी धवल - दीक्षित जी,   

उत्तम खेती, मध्यम बान, निकृष्ट चाकरी, भीख निदान | नौकरी से जो भी समय मिला साहित्य सृजन एवं उसके पठान पाठन में दिया | कहानी, कविता, लघुकथा, गीत, ग़ज़ल, नयी कविता, यात्रा वृत्रांत, मुक्तक, निबंध आदि विधाओं में रचनाएँ हुईं | इस बीच मैंने कई नाटकों में अभिनय भी किया | मेरी एक कहानी ‘कोई है ..’ का कई बार मंचन लखनऊ में किया गया | विभाग के सांस्कृतिक कार्यक्रमों बढचढ कर हिस्सा लेता हूँ | आकाशवाणी लखनऊ, दूरदर्शन एवं एफ एम आदि से अक्सर प्रस्तुतियां प्रसारित होती रहती हैं | मेरे लिखे गीतों पर एल्बम भी जारी हुए हैं | कोरोना काल में ‘कोरोना चालीसा’ सहित दर्जनों गीत यूट्यूब चैनलों पर प्रसारित एवं लोकप्रिय हुए हैं |

भूपेन्द्र दीक्षित-तिवारी जी, सामाजिक क्षेत्र में आपने क्या क्या किया ?

 प्रदीप तिवारी धवल -      

सामाजिक, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक गतिविधियों को संचालित करने हेतु मैंने स्वयं वर्ष 2000 में ‘राघवेंदु सेवा समिति’ की स्थापना की है | इस संस्था के माध्यम से मुखतः नशा उन्मूलन, पर्यावरण, प्रदूषण, वानिकी, जनसँख्या वृद्धि, भ्रूण हत्या आदि विषयों पर समय समय पर कार्यक्रम आयोजित होते रहते हैं | सामाजिक क्षेत्र में इसी माध्यम से सेवा प्रदान करने की कोशिश कर रहा हूँ 
भूपेंद्र दीक्षित- आपकी दृष्टि में साहित्य क्या है ? किन साहित्यकारों का साथ रहा ? कोई उल्लेखनीय संस्मरण ।

 प्रदीप तिवारी धवल -      

मेरी दृष्टि में साहित्य वह है जो समाज को संवेदनशील बनाये | क्योंकि संवेदनशीलता ही व्यक्ति में प्रेम, करुणा, दया, ममता और अनुराग को जाग्रत करती है | चूंकि साहित्य ही है जो कि संवेदनशीलता को खाद पानी से अभिसिंचित करता है | साहित्यहीन समाज सदैव संवेदनहीन होगा | मेरे हिसाब से संवेदनशीलता का बीजारोपण साहित्य के गर्भ में होता है |

बहुत बड़े व नामी गिरामी साहित्यकारों की छत्रछाया मेरे ऊपर नहीं रही | न ही मेरी मित्र मंडली में कोई बड़ा साहित्यकार है जिसका मुझे आशीर्वाद प्राप्त हो और न ही मैंने इनकी नर्सरी में कभी समर्पित भाव से आवेदन किया | अभी तक किसी मंडली की सदस्यता प्राप्त नहीं कर सका हूँ, किसी मूर्धन्य साहित्यिक गुरु की तलाश जारी है ..|

भूपेन्द्र दीक्षित- सीतापुर अवधी का गढ़ रहा है । संक्षेप में कुछ बताएं।

 प्रदीप तिवारी धवल - 

महाकवि नरोत्तमदास, अवधी कवि आदरणीय श्री बलभद्र प्रसाद दीक्षित जी एवं शायर जनाब जां निसार अख्तर जी तथा शदीद कैप्टन मनोज पाण्डेय जी की पावन भूमि रही सीतापुर के वर्तमान अवधी धुरंधरों में गोमा तीरे की रचयिता डॉ ज्ञानवती दीक्षित एवं श्री भूपेंद्र दीक्षित जी को उनकी रचनाओं के माध्यम से थोडा बहुत जानता हूँ |

भूपेन्द्र दीक्षित- अपने क्षेत्र के मूर्धन्य साहित्यकारों के विषय में बताएं।

 प्रदीप तिवारी धवल -      

प्रश्न संख्या चार में वर्णित साहित्यकारों के अलावा इस क्षेत्र के बहुत कम लोगों को जानता हूँ |

भूपेन्द्र दीक्षित - वर्तमान साहित्यकारों के विषय मेंकुछ बताएं ।

 

प्रदीप तिवारी धवल -          

वर्तमान साहित्यकारों को संचार माध्यम से जितना पढ़ समझ सका हूँ मात्र उतना ही उनके बारे में जानता हूँ | सच्चाई तो यह है कि मेरा पठन एवं पाठन का पक्ष अत्यंत कमजोर रहा है | हिंदी की पत्रिकाएं हंस, वागर्थ, कथाक्रम, अपरिहार्य आदि पढता रहा हूँ | परन्तु इन दिनों नागार्जुन, मुक्तिबोध, फणीश्वर नाथ रेणु, हरिशंकर परसाई को पढने का प्रयास कर रहा हूँ |

भूपेन्द्र दीक्षित- प्रदीप तिवारी जी, अपनी कृतियों‌ के विषय में बताएं।

प्रदीप तिवारी धवल -          

1. “चल हंसा वाही देस” कविता संग्रह, सन 2012, अनामिका प्रकाशन, तुलाराम बाग, प्रयागराज |

2. “अगनित मोती” अवधी सूक्तियां, सन 2016, शिवांक प्रकाशन, दरिया गंज, नई दिल्ली |

3. “मौन नहीं रह पाऊँगा” कविता संग्रह, सन 2019, अनामिका प्रकाशन, तुलाराम बाग, प्रयागराज |भूपेन्द्र दीक्षित- आपकी भविष्य की योजनाएं क्या हैं? वर्तमान साहित्यिक माहौल के विषय में क्या सोचते हैं?

प्रदीप तिवारी धवल –

कोरोना काल में अवधी की बहुत सारी रचनाएँ हुई हैं, भविष्य में अवधी रचनाओं के संकलन का विचार बन रहा है, जिसे जल्दी ही मूर्तरूप देने की योजना है | साहित्य खेमों में बंटा हुआ है दलित साहित्य, स्त्री साहित्य, बाल साहित्य, सर्वहारा साहित्य, वाम साहित्य, धर्म साहित्य | इन खेमों के जिम्मेदारों में आपसी सहमति की घोर कमी है, सभी अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग छेड़े हुए हैं | सबके अपने छद्म स्वार्थ हैं, निःस्वार्थ भाव से साहित्य का सृजन नहीं हो पा रहा है | साहित्यकार आज विभिन्न वादों के अलमबरदार हो रहे हैं | यह परिस्थिति साहित्य की कर्मभूमि नहीं वरन अंत्येष्टि स्थल को जन्म देती है | फिर भी निराशाओं से ही अंकुर फूटते हैं इसलिए गुणात्मक सृजन के प्रति आशान्वित हूँ |

  भूपेन्द्र दीक्षित- नई पीढ़ी के लिए आपका क्या संदेश है?

प्रदीप तिवारी धवल –

वर्तमान साहित्यिक परिदृश्य को देखने से लगता है कि नए साहित्यकार बहुत जल्दी में हैं, उनमें लोकप्रिय होने की अपार भूख दिखती है, अपनी रचनाओं के बजार हेतु कुछ भी अनाप शनाप समझौते करने को तत्पर हैं | सम्मान की दुकानों / एजेंटों ने इसमें घी का काम किया है | कुकुरमुत्ते की तरह सम्मान बाँटने की संस्थाएं उग आई हैं | ये साहित्य का भला कम नुक्सान ज्यादा कर रही हैं | फिर भी साहित्यक सृजन खूब हो रहा है | मेरा मानना है कि साहित्य की मात्रा से ज्यादा उसकी गुणवत्ता पर ध्यान केन्द्रित करने की आवश्यकता है | सोसल मीडिया बहुत बड़ी भूमिका निभा रहा है | यह भूमिका धनात्मकता लिए हुए हो यही नई पीढी के साहित्यकारों से अपेक्षा है | नई पीढी में सृजन की सघनतम दृष्टि मौजूद है, उसे आपके पंडानामा जैसे अंकुश से और संवारा जा सकता है |

 

मैं आपको इस अकिंचन को यह महती सम्मान देने हेतु ह्रदय से बहुत बहुत आभार व्यक्त करता हूँ और कृतज्ञता प्रकट करता हूँ |

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