साहित्यिक पंडानामा:८७०


भूपेन्द्र दीक्षित


दिन रात राजनीति राजनीति खेली जाती है ।हर टीवी चैनल, हर अखबार ,हर आदमी, हर गली कूचे में एक ही चर्चा।किसको मिले कुर्सी? किस्सा कुर्सी का। औचित्य अनौचित्य भाड़ में जाए।देश जाए जहन्नुम में।हमको क्या?


 मुझे स्मरण आता है स्वनामधन्य सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का ।उन्होंने लिखा‘. . . कोई भी राजनीतिक दल आम आदमी के साथ नहीं है. सबने अपने मतलब से उसे छला है. वह अपनी लड़ाई में अकेला है. मैं उसके साथ किसी राजनीतिक दल के नेता की तरह नहीं हूं. न उनकी तरह उसका नाम लेता हूं. मैं भौतिक रूप से भी और संवेदना के स्तर पर भी उसकी यातना झेलता हूं अतः मेरी कविता उससे अलग नहीं हो सकती.’ [‘कुआनो नदी’ की भूमिका: सर्वेश्वर रचनावली, खंड 2, वाणी प्रकाशन 2004.]


 कितना स्पष्ट विजन है ।एक आम आदमी से किया हुआ वादा ,अपने आप से किया हुआ वादा।


 


आम आदमी से किया यह वायदा कवि ने अपने जीवन भर निभाया ।एक संवेदनशील हृदय आख़िर यही तो कर सकता है कि वह ‘खूंटियों पर टंगे हुए लोगों’ को समझाए कि जब गोलियां चलती हैं तो सबसे पहले मारे जाने वाला आदमी वह होता है जो क़तार में सबसे पीछे का आदमी होता है।


 


'यह वह आदमी था जो ‘जब सब बोलते थे/वह चुप रहता था/ जब सब चलते थे/ वह पीछे हो जाता था/ जब सब खाने पर टूटते थे वह अलग बैठा टूंगता रहता था-


 


‘ लेकिन जब गोली चली


तब सबसे पहले वही मारा गया.’ [खूंटियों पर टंगे लोग]


 


कभी-कभी समाज लेखकों, कवियों और कलाधर्मियों से कुछ ज़्यादा ही उम्मीदें कर लेता है, तो कभी-कभी इसके उलट सृजन करने वाला मन अपनी सीमाओं को स्वीकार न करके अपना ही आकलन करने में चूक जाता है


 


परिणामस्वरूप वह या तो मुक्तिबोधीय आत्म-धिक्कार में पहुंच जाता है या फिर व्यक्तित्व की अज्ञेयात्मक स्वायत्तता की खोज करने लगता है। सर्वेश्वर का फंडा क्लियर है ।‘कुआनो नदी’ की भूमिका में उन्होंने लिखा-


 


‘मैं यह जानता हूं कि कविता से समाज नहीं बदला जा सकता. जिससे बदला जा सकता है वह क्षमता मुझमें नहीं है. फिर में क्या करूं? चुप रहूं? उसे ख़ुश करने का नाटक करूं, भड़ैती करूं? … सच तो यह है कि मैं कविता लिखकर केवल अपना होना प्रमाणित करता हूं. मैं यह मानता हूं कि हम जिस समाज में हैं, जिस दुनिया में हैं वहां हमें अपना होना प्रमाणित करना है।'क्रमश:


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