साहित्यिक पंडा नामा:८७४


भूपेन्द्र दीक्षित


साहित्य कोकिला महादेवी की पुण्य स्मृति को नमन। बहुत से कवि और कवयित्रियां हुए,पर महादेवी एक ही थी।गद्य लेखिका महादेवी वर्मा साहित्य और संगीत में निपुण थीं,कुशल चित्रकार और श्रेष्ठअनुवादक थीं। उन्हें हिन्दी साहित्य के तमाम श्रेष्ठ पुरस्कार प्राप्त करने का गौरव प्राप्त है। शताब्दी की सर्वाधिक लोकप्रिय महिला साहित्यकार महादेवी भारत की 50 सबसे यशस्वी महिलाओं में एक हैं।महादेवी वर्मा और सुभद्रा कुमारी चौहान के बीच बचपन से मित्रता थी।


 


आपका जन्म फ़र्रूख़ाबाद, उत्तर प्रदेश के एक संपन्न परिवार में हुआ था। इस परिवार में सात पीढ़ियों के बाद महादेवी जी के रूप में पुत्री का जन्म हुआ था। इन्हें घर की देवी- महादेवी मानकर बाबा ने इनका नाम महादेवी रखा था।


 


महादेवी वर्मा के हृदय में शैशवावस्था से ही जीव मात्र के प्रति करुणा भाव रहा। उन्हें ठण्डक में पिल्लों का ध्यान रहता था। वे पशु-पक्षियों का पालनपोषण और उनके साथ खेलकूद में ही दिन बिताती थीं। चित्र बनाने का शौक भी उन्हें बचपन से ही था। इस शौक की पूर्ति वे पृथ्वी पर कोयले आदि से चित्र उकेर कर करती थीं। उनके व्यक्तित्व में जो पीडा, करुणा और वेदना है, विद्रोहीपन है, अहं है, दार्शनिकता एवं आध्यात्मिकता है तथा अपने काव्य में उन्होंने जिन तरल सूक्ष्म तथा कोमल अनुभूतियों की अभिव्यक्ति की है, इन सबका आरंभ बाल्यावस्था से ही हो गया था।


 


महादेवी जी की शिक्षा 1912 में इंदौर के मिशन स्कूल से प्रारम्भ हुई साथ ही संस्कृत, अंग्रेजी, संगीत तथा चित्रकला की शिक्षा अध्यापकों द्वारा घर पर ही दी जाती रही। 1916 में विवाह के कारण कुछ दिन शिक्षा स्थगित रही। विवाहोपरान्त महादेवी जी ने 1919 में बाई का बाग स्थित क्रास्थवेट कॉलेज इलाहाबाद में प्रवेश लिया और कॉलेज के छात्रावास में रहने लगीं। महादेवी जी की प्रतिभा वहीं से निखरी।


 


1921 में महादेवी जी ने आठवीं कक्षा में प्रान्त भर में प्रथम स्थान प्राप्त किया और कविता यात्रा के विकास की शुरुआत भी इसी समय और यहीं से हुई। वे सात वर्ष की अवस्था से ही कविता लिखने लगी थीं और 1925 तक जब अपनी मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की थी,वह एक सफल कवयित्री के रूप में प्रसिद्ध हो चुकी थीं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताओं का प्रकाशन होने लगा था। पाठशाला में हिंदी अध्यापक से प्रभावित होकर ब्रजभाषा में समस्यापूर्ति भी करने लगीं। फिर तत्कालीन खड़ीबोली की कविता से प्रभावित होकर खड़ीबोली में रोला और हरिगीतिका छंदों में काव्य लिखना प्रारंभ किया। उसी समय माँ से सुनी एक करुण कथा को लेकर सौ छंदों में एक खंडकाव्य भी लिख डाला। कुछ दिनों बाद उनकी रचनाएँ तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगीं। विद्यार्थी जीवन में उन्होंने प्रायः राष्ट्रीय और सामाजिक जागृति संबंधी कविताएँ लिखीं। मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पूर्व ही उन्होंने ऐसी कविताएँ लिखना शुरू कर दिया था, जिसमें व्यष्टि में समष्टि और स्थूल में सूक्ष्म चेतना के आभास की अनुभूति अभिव्यक्त हुई है। उनके प्रथम काव्य-संग्रह 'नीहार' की अधिकांश कविताएँ उसी समय की हैं।


 


महादेवी जैसे प्रतिभाशाली और प्रसिद्ध व्यक्तित्व का परिचय और पहचान तत्कालीन सभी साहित्यकारों और राजनीतिज्ञों से थी। वे महात्मा गांधी से भी प्रभावित रहीं। सुभद्रा कुमारी चौहान की मित्रता कॉलेज जीवन 


से थी। पन्त जी के पहले दर्शन भी हिन्दू बोर्डिंग हाउस के कवि सम्मेलन में हुए थे और उनके घुँघराले बड़े बालों को देखकर उनको लड़की समझने की भ्रांति भी हुई थी। महादेवी जी गंभीर प्रकृति की महिला थीं लेकिन उनसे मिलने वालों की संख्या बहुत बड़ी थी। रक्षाबंधन, होली और उनके जन्मदिन पर उनके घर जमावड़ा सा लगा रहता था। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला से उनका भाई बहन का रिश्ता जगत प्रसिद्ध है। उनसे राखी बंधाने वालों में सुप्रसिद्ध साहित्यकार गोपीकृष्ण गोपेश भी थे। सुमित्रानंदन पंत को भी राखी बांधती थीं और सुमित्रानंदन पंत उन्हें राखी बांधते। इस प्रकार स्त्री-पुरुष की बराबरी की एक नई प्रथा उन्होंने शुरू की थी। वे राखी को रक्षा का नहीं स्नेह का प्रतीक मानती थीं।वे जिन परिवारों से अभिभावक की भांति जुड़ी रहीं उसमें गंगा प्रसाद पांडेय का नाम प्रमुख है, जिनकी पोती का उन्होंने स्वयं कन्यादान किया था। गंगा प्रसाद पांडेय के पुत्र रामजी पांडेय ने महादेवी वर्मा के अंतिम समय में उनकी बड़ी सेवा की। इसके अतिरिक्त इलाहाबाद के लगभग सभी साहित्यकारों और परिचितों से उनके पारिवारिक संबंध थे।


प्रस्तुत है उनकी एक कविता-


था कली के रूप शैशव में अहो सूखे सुमन 


 


हास्य करता था, खिलाती अंक में तुझको पवन 


 


खिल गया जब पूर्ण तू मंजुल, सुकोमल पुष्पवर


 


लुब्ध मधु के हेतु मंडराते लगे आने भ्रमर। 


 


स्निग्ध किरणें चंद्र की तुझको हंसाती थी सदा 


 


रात तुझ पर वारती थी मोतियों की संपदा 


 


लोरियां गाकर मधुप निद्रा-विवश करते तुझे 


 


यत्न माली कर रहा आनंद से भरता तुझे। 


 


कर रहा अठखेलियाँ इतरा सदा उद्यान में 


 


अंत का यह दृष्य आया था कभी क्या ध्यान में?


 


सो रहा अब तू धरा पर शुष्क बिखराया हुआ 


 


गंध कोमलता नहीं मुख मंजु मुरझाया हुआ।


आज मुक्तिबोध की भी पुण्य तिथि है।वे समकालीन अद्भुत कवि हैं।बड़ी मुश्किल से उनकी ऐसी तस्वीर खोज पाया हूं, जिसमें सिगरेट नहीं घुसा था।उनकी एक कविता देता हूं-


ज़िन्दगी के...


कमरों में अँधेरे


लगाता है चक्कर


कोई एक लगातार;


आवाज़ पैरों की देती है सुनाई 


बार-बार....बार-बार, 


वह नहीं दीखता... नहीं ही दीखता, 


किन्तु वह रहा घूम 


तिलस्मी खोह में ग़िरफ्तार कोई एक, 


भीत-पार आती हुई पास से, 


गहन रहस्यमय अन्धकार ध्वनि-सा 


अस्तित्व जनाता


अनिवार कोई एक,


और मेरे हृदय की धक्-धक् 


पूछती है--वह कौन 


सुनाई जो देता, पर नहीं देता दिखाई ! 


इतने में अकस्मात गिरते हैं भीतर से 


फूले हुए पलस्तर, 


खिरती है चूने-भरी रेत 


खिसकती हैं पपड़ियाँ इस तरह-- 


ख़ुद-ब-ख़ुद 


कोई बड़ा चेहरा बन जाता है।


उन्हें नमन।


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