माथे पर सजती है हिंदी


जिह्वा पर रहती है हिंदी।


माथे पर सजती है हिंदी।।


 


हिंदी मेरी हृदय संगिनी।


हिंदी ही है राग रागिनी।।


हिंदी मेरी सखी-सहेली।


हिंदी लगती नही पहेली।।


 


आँखों में बसती है हिंदी।


माथे पर सजती है हिंदी।।


 


हिंदी की बस यही कहानी।


हिंदी ओढ़े चुनरी धानी।।


हिंदी जीवन की परिभाषा।


हिंदी सांसों की...प्रत्याशा।।


 


अमृत सी लगती है हिंदी।


माथे पर सजती है हिंदी।।


 


सुर में घुल संगीत बनाती।


बैरी को भी मीत बनाती।।


कर्णों को अति प्यारी लगती।


भाषाओं में न्यारी लगती।।


 


वीणा सी बजती है हिंदी।


माथे पर सजती है हिंदी।।


 


हिंदी हाथो की कंगन है।


हिंदी सांसों की स्पंदन है।


हिंदी सिंदूरी रंगो सी।


हिंदी शुभता के अंगो सी।।


 


दुल्हन सी दिखती है हिंदी।


माथे पर सजती है हिंदी।।


 


भारत माँ की शान यही है।


गर्व सभी की मान यही है।।


जन-जन को अपनी सी लगती।


सबके जीवन में यह फलती।।


 


जननायक लगती है हिंदी।


माथे पर सजती है हिंदी।।


 


खनके चूड़ी सी हाथों में।


चमके बिंदिया सी माथों मे।


हीरे की मुनरी सी लगती।


नाक चढ़े नथनी सी लगती।।


 


पायल सी बजती है हिंदी।


माथे पर सजती है हिंदी।।


 


हार गले की मेरे लगती।


झुमके सी कानो में सजती।।


करधन सी ये कमर टिकी है।


जेवर सी पर नही बिकी है।।


 


बन-ठनकर चलती है हिंदी।


माथे पर सजती है हिंदी।।


 


प्रियंका दुबे 'प्रबोधिनी'


गोरखपुर, उत्तर-प्रदेश।


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