लघुकथा- गवार


जया विनय तागड़े


 जाने कैसा आदमी है..? न मीठी मीठी बातें करता है, न प्यार दर्शाता है। हमारे साहब को देखो मेमसाब को कितना प्यार करते है। गुलाब देते है; वो भी घुटनो के बल बैठकर, ज़ैसे की फ़िलम में दिखाते है। और हमारी मेंम साहब .....है भी कितनी सुंदर ....ज़ैसे की परी। यही फर्क होता है- पढ़े लिखे और गँवारो मे।


      और एक मेरे पति को देख लो। हाँ भई...! हाथो में राइफ़ल थामे एक गँवार सिक्योरटी गार्ड से भला क्या उम्मीद की जा सकती है..? आज इतनी देर कैसे कर दी। वैसे तो मेरे घर लौटने तक वो भी आ ही जाते है। मुझे काम से घर पहुँचे एक घण्टा हो गया है। बाहर कितना अँधेरा भी हो गया है। जाने कहाँ रह गए है..? 


( शान्ति घरेलू कामगार है । वो जिस बंगले पर काम करती है; वो साहब अपनी पत्नि से बड़ा स्नेह रखते है। उससे हमेशा प्यार से पेश आते है। लेकिन शांति का पति ऐसा नही करता। शांति अपने पति की तुलना साहब से कर मन ही मन बड़बड़ाती है। ) और तभी.....


 


"आह आह माँ..! मुझे फिर से मितली सी आ रही है।" 


 


"हे राम..!अब क्या हुआ मुन्ने..? ज़रा देखु तो...। ये क्या तुझे तो फिर से बुखार आ गया। साइकिल रखने की आवाज़ आ रही है। लगता है तेरे पापा भी आ गए।"


 


"क्या हुआ शांति..! मुन्ने के सर पर ये पट्टी कैसी..? बुखार है क्या..?"


 


"हाँ, इसे सबेरे डॉक्टर को दिखाया था। दवाई लेने से बुखार उतर गया ।फ़िर मैं काम पर चली गई। आज मेमसाहब को उनके मायके जाना था; सो उनकी तैयारी के लिए जाना जरूरी था।"


 


"हाँ....! तो मुन्ने को दुबारा दवाई दे दो। कहाँ रखी है; लाओ मैं ला देता हुँ।"


 


"दवाई तो मेरे बटुऐं में थी। और वो बटुआँ मेमसाहब के कमरे में ही रह गया। अब क्या करें..?"


 


"कोई बात नही...! उनका बंगला तो यही पास ही में हैं न। चलो चलकर ले आते है।" 


 


"हाँ चलो। मुन्ने को तब तक अम्माँ संभाल लेगी।"


 


(रास्ते मे..)


 


"आज तुम्हें इतनी देर कैसे हो गई..?" 


 


"बस स्टाप पर एक मेडम खड़ी थी शांति। उनकी बस छूट गई थी। बेचारी अगली बस के इंतज़ार में खड़ी थी। उनको अकेला देख कुछ बदमाश छेड़खानी करने लगे। मैं उनके साथ जाकर खड़ा हो गया, जब तक कि बस नही आ गई। उनको सुरक्षित बस में बैठाकर मैं वहाँ से निकला।" 


 


"लो पहुँच गए बंगले तक। जाओ तुम जाकर अपना बटुआँ ले आओ।"


 


शांति ने डोरबेल बजाई। अंदर से बाते करने की आवाज़ आई। साहब की आवाज़ थी। साहब किसी से कह रहे थे-"देखो शायद ड्राइवर सोडा की बॉटल ले आया होगा।" (और तभी दरवाज़ा खुलता है।) नाईट ड्रेस पहने एक युवती दरवाज़े पर दिखाई देती है। (उस युवती का नाईट ड्रेस देख शांति मन ही मन बड़बड़ाती है "लेकिन ये नाईट ड्रेस तो मेमसाब का है।") शांति को चुपचाप घुरता देख युवती कहती है "येस"-


 


 "वो साहब हैं क्या..?"- शांति ने उत्तर दिया।


 


"हाँ" लेकिन तुम कौन हो..?"


 


 "वो.. वो.. साहब से कहना शांति आई है; शांति बाई" शांति ने जल्दी से कहाँ। 


 


"डार्लिंग तुम्हारी बाई आई है।" अंदर की तरफ़ मुहँ घुमाए युवती बोली।


 


"अच्छा अंदर आने दो।" साहब बोले।


( शांति तेज़ी से अंदर गई। और बोली- "साहब मेरे बच्चे को बुखार है; मेम साब की तैयारी करवाने में मेरा दवाई का बटुआँ आपके कमरे में ही रह गया। मैं जाकर ले लू क्या..?"


 


 "हा.. हा.. जाओ जाकर ले लो।" साहब बोले।


 


शांति कमरे में पहुँची ।उसे अपना बटुआँ वही टेबल पर पड़ा मिल गया। कमरे की हालत देखकर शांति का शक यकीन में बदल गया। वो तेज़ी से हॉल में आई। तो देखा साहब नशे में झूल रहे है ;और वो युवती साहब के आगोश में है। शांति ने अपने कदम तेज़ी से बाहर की ओर आगे बढ़ाए। जहाँ उसका गँवार पति उसका इंतजार कर रहा था।


 


✍️ जया विनय तागड़े


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