जागरण गीत 


सूर्य दीप्ति को तेज हीन 


जब करने लगे श्यामल बदरी 


जब बिना चन्द्र ही यात्रा में


निकल पड़ी हो विभावरी ।


 


लिखते जाना तुम अविरत 


दिवा के आगमन गीत  


ओज तेज के परि पूरक 


चिर शक्ति के जो हों प्रतीक ।


 


जो राम सेतु के पत्थर हों 


भव सागर में भी ना डूबें 


हों अटल भक्ति प्रहलाद की वो 


जो जलकर के भी ना छूटें ।


 


आकाशगंगा में विद्यमान 


ध्रुव तारे जैसे दीप्तिमान 


वो गीत बने रथ का पहिया 


घायल अभिमन्यु का स्वाभिमान ।


 


सूर्य के सातों अश्वों से 


जो तीव्र, धवल, बलशाली हों 


वो गीत हों लाठी का संबल 


जिनसे जन्मी आज़ादी हो ।


 


द्वेष से जब सृष्टि में 


अनुराग गौड़ हो जाएगा 


वो गीत तब गांडीव बन 


खुद पर विश्वास सिखाएगा ।


 


संघर्ष तरू की मंजरी से 


मांग कर के बल लिखना 


वातायन में पथ भूला है आज 


उस गीत का तुम कल लिखना ।


 


तिरस्कार से आहत हो 


तुम मौन ना होना आज प्रिए 


नभ से पर्वत तक गूंजे जो 


उस गीत का हो निर्माण प्रिए । 


 


 


  हर्षिता सिंह 


रायबरेली


 


 


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