इंसान


बढ़ती जा रही है अट्टालिकाऐं


घटती जा रही सूर्य की किरणें 


जीवन में उतरती जा रही है 


झूठ की गहराईयाँऔर छुपती


जा रहीं हैं सच की परछाईंयाँ


इंसान भटकता जा रहा है 


रिश्तों से हटता जा रहा है 


 प्यार,स्नेह,विश्वास, अपनत्व


ममत्व खोता ही जा रहा है 


नफरत,जाति,लोभ, ईष्र्या


जलन में डूबता जा रहा है


जीवन से भागता जा रहा है


मृत्यु से डरता जा रहा है 


है न राहो की खबर न मंज़िल 


की बस दौड़ता जा रहा है


उलझता चला जा रहा है ||


 


स्वरचित:- डाॅ. पुनीता त्रिपाठी


शिक्षिका , महराजगंज उ.प्र.


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