बहुत बार हमारी ज़िंदगी हास्पिटल जैसी हो जाती है और हम ओपीडी जैसे


बहुत दुःख होता है निराशाओं को वापस जाते देखना लेकिन इसी बीच जाने अनजाने में कुछ निराशाओं का प्रिय पता हम ही हो जाते हैं फिर भी हम आशान्वित करने की धर्मिता को ही जी रहे होते हैं।


 


ऐसे में जब निराशायें अपने निरे ठेठ स्वभाव को छोड़कर आशा में परिणत होकर जाती हैं तो बड़ा सुखद अनुभव होता है ऐसे में बहुत आवश्यक है स्वयं हमारा भी रेचित होते रहना। 


 


हम ओपीडी जैसे रहें यह अच्छी बात है किंतु अपने लिये भी ओपीडी हमें ही होना होगा ताकि हास्पिटल में एक मरीज ही मरीज का इलाज करते न मिले।


 


    सर्वे भवंतु सुखिनः


 


   आकृति विज्ञा 'अर्पण'


                 (


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