संस्कार


क्रोध में प्रतिशोध में ,
मन शांत हो अवरोध में,
वाणी में हो संयम सदा ,
आवेग हो न बिरोध में,
भाषा की मर्यादा में ही ,
कुल की झलक दिख जाती है,
आपमें तहज़ीब कितनी ,
खुद ज़ुबाँ कह जाती है,


घायल घमंडी घाघ बन ,
दुष्कृत्य करना छोड़ दे,
काम से ब्याभिचार से ,
तू दृष्टि अपनी मोड़ ले,


धन धान्य से परिपूर्ण हो ,
पर ज्ञान से किंचन अभी,
माया की अभिलाषा से ,
जग में शत्रु बनते है सभी,


उर की ये बढ़ती लालसा ,
खुद को दफन कर जाती है,
आपमें तहज़ीब कितनी ,
खुद ज़ुबाँ कह जाती है,
भाषा की मर्यादा--------------------------,


त्याग दो आलस्य को ,
साहस से बढ़ते चलो,
चित्त को एकाग्र कर ,
रिपुदमन तुम करते चलो,


निश्चित मिलेगा लक्ष्य तुझको ,
मन में गर संकल्प हो,
संकल्प हो बस एक ही ,
कोई संकल्प का न बिकल्प हो,


खुद की ये प्रतिबद्धता ,
जीवन सफल कर जाती है ,
आपमें तहज़ीब कितनी ,
खुद ज़ुबाँ कह जाती है,
भाषा की मर्यादा -----------------------------------,


के.एम.त्रिपाठी
(स्वरचित)


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