सावन

कहानी 



भला ऐसा भी हाे सकता है क्या कि सावन का नाम या माह आये और किसी के मस्तिष्क में कुछ यादें या सपने ना आए। सावन एक सुनहरे सपने व ठण्डी बारिश के बूंद के समान है जाे पूरे तन में एक अलग स्फूर्ति जगाती है। किसी काे मायके/ससुराल की, किसी काे झूले की, किसी काे सखियाें/दाेस्ताें की ताे किसी काे प्रेम की याद आती ही आती है। ऐसा ही एक मिलन हुआ। मैं विश्वविद्यालय में एडमिशन लेने के उपरान्त ही कहीं अकेला घूमने चला गया था कुछ दिन की छुट्टियाँ लेकर। चूंकि उस गांव में लगातार पाँच दिन तक जाना था कुछ काम से ताे गाँव के लाेंगाे ने मेरे ठहरने की व्यवस्था गाँव में ही कर दी। गांव में जब काम चला ताे एक मधुर सुर वाली लड़की तपाक से आतर बाेलती ऐ बाबू ! तुम लाेग कहां से आये हाे और क्या करना है यहां। मैं देखता रहा कि सबकाे पता है हम यहां क्याें आये इसकाे नहीं पता और ये है काैन ??? बाद में पता चला वाे लड़की उस गांव की सबसे साक्षर लड़की थी। इसके साथ ही उसमें बचपन भी कूट-कूट कर भरा था। कभी कपड़े प्रेस के जलाकर देती ताे कभी खाने में राेटी काे छाेड़कर सब कुछ थाली में लगाकर भेजती। कभी आधा गिलास पानी भेजती ताे कभी बाेलती जाओ जाकर कुएं से निकालाे तब पीना। कभी जबरदस्ती नींव के झूले पर ले जाकर जबरदस्ती झूलने काे कहती इस शर्त के साथ कि किसका झूला सबसे ऊंचा जायेगा। एक बार गांव में ही बम्बा पर नहाने गये ताे चाेरी से उसने हम लाेंगाे के कपड़े उठाकर बुजुर्गाें के कपड़े रख दिये जिसमें धाेती और कुर्ते थे। एक बार जब बारिश से भीगे ताे उसी का सहारा लेना पड़ा बारिश से बचने काे और उसके घर तक पहुँचने के लिये।


बाद में पता चला कि उसने इसी बहाने हमारा सारा विवरण पता तर लिया और खुद का कुछ ना पता चलने दिया सिवाय इसके कि वाे आकर्षित है। जब वहां दाैरे पर काेई अधिकारी आया ताे रिपाेर्ट और काम के बारे में जानना चाहा ताे हमारी टीम ने सकुशल उत्तर दिये। बाद में जब गांव वालाें से पूछा ताे उसकाे बुलाया गया क्युंकि गांव के सारे लाेग प्रधान कहकर बुलाते थे। उसने अधिकारी काे और भी अन्य समस्याओं से अवगत कराया व वर्तमान कार्य की व टीम की मेहनत के बार में बताया। आज वह लड़की अपने ही गांव में सरकार की बहुत सारी याेजनायें लेकर आती है और खुद अपने देखरेख में कार्य करवाती है। टीम के कुछ लाेग बाेले भाई आपका कुछ ताे मामला है इसके साथ 😊


नहीं ताे इतना काेई भी ना पूछता। आज भी वाे बाबू कहकर संबाेधित करती है और कहती है कि आप हमारे गांव के जीवन में ही नहीं अपितु मेरे जीवन में भी बहुत महत्व रखते है ताे मैं पूछा गांव का ताे पता चल गया लेकिन तुम्हारे जीवन से ना समझा उसने झट से चेहरा घुमाते हुये बाेला कुछ बातें इशाराें से भावनाओं से खुद समझ जानी चाहिये। यह कहकर वाे चली गयी और हम सबने गांव से काम हाेने के बाद विदा ली। सच में कहीं पागल ही थी वाे नटखट सी प्रधान।


 


        स्वरचित
शिवम पचौरी
      फ़िराेज़ाबाद


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