साहित्यिक  पंडानामा :८१०


भूपेन्द्र दीक्षित
साहित्य  का सम्मान  परिवार  से आरंभ होता है।जब साहित्य  और साहित्यकार  का सम्मान  परिवार  में  होता है,तभी नई पीढ़ी  उसका सम्मान  करना सीखती है।आज अंग्रेजी  विद्यालयों  में  हिन्दी  की उपेक्षा  देखते बड़े हो रहे बच्चों  को काऊ और डागी कह कर माँ  शिक्षा  देती है ,तो साहित्य  का सम्मान  माम और डैड कह कर बड़ा हुआ बच्चा करेगा,इसकी कल्पना  आकाश कुसुम  है।
           आपसे कोई पूछे -आप क्या करते हैं? अगर आप कहें -मैं  लेखक हूँ ।तुरंत प्रतिप्रश्न आएगा-काम क्या करते हैं? यानी लेखन कोई  कार्य  नहीं ।यह सम्मान  है साहित्य  का।आज लाखों  लोग अपनी कलम से रोजी रोटी कमा रहे हैं, लेकिन  आम लोगों  की दृष्टि  में  साहित्यकार  निठल्ला है।उसके पास कोई  काम नहीं ।
एक भाई ने मुझ पर व्यंग्य  लिखा-एकान्त में  साहित्य  साधना  करते हैं ।अब बताइये क्या साहित्य  साधना  भीड़  में  हो सकती है?यानी अगर मैं  जमघट में  गाता बजाता नहीं, तो कैसा  साहित्यकार  हूँ ।अरे मित्रों! लेखन तपस्या  है।अथाह समुद्र  में  करोड़ों  डुबकियां लगाओगे,तब एक बूंद रस की प्राप्ति  होगी।जीवन व्यर्थ  भी जा सकता है।
प्रकृति  के यौवन का श्रृंगार, 
करेंगे  कभी न बासी  फूल ।
मिलेंगे  वे जाकर अतिशीघ्र,
आह उत्सुक है उनको धूल।।(कामायनी)


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