गफलत


किस गफलत में जी रहें हैं,कैसा ये गुमान है,
आँख खोलकर भी ,सो रहा ये जहान है,
एक दूजे से इस कदर लड़ रहे हैं जो,
छाया हर ओर बस घमासान है,


कुछ सबक न लिया ,गल्तियों से,
फिर से आफत में ये जान है,


हम करेंगें अपनी मनमानियां बस
सब खुदी से परेशान हैं 


अब तो अपने भी होते पराये ,खुद से घर में ही मेहमान हैं


बस्तियां उजड़ गयी हैं शहर लगते अब शमशान हैं,


एक घर में ही रहते हैं लेकिन हम दिलों से अन्जान है,


की मती वक्त हमने गंवाया,हम कितने अन्जान हैं
संतोषी दीछित-कानपुर


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