गदराईल मन


गदराईल मन
बऊराईल मन
देखीं न अक्ताईल मन
खूब चलीं अ खूबें दउड़ीं
एहि बीच अलसाईल मन
गईलीं जब सोनरा के नगरी
खूबे खूब ललचाईल मन
बात पड़ल जब मान मनौती
हरि अंगना हो आईल मन
बोझा भईलें नात बतैकी
 दान पुण्य क आईल मन
महक अघाये सगरो बगिया
फिरो हमरो मुरझाईल मन
एक सपन संग एक नींद में
कहां कहां हो आईल मन
     #आकृति विज्ञा 'अर्पण'


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