क्यों की कोई देश निर्बल दुर्बल और उपेक्षित जनता के साथ सबल राष्ट्र नहीं बनता


क्या वर्तमान सरकार भी पिछली सरकारों की तरह पूर्वांचल विरोधी समझ की सरकार हैं ?


क्या ऐसा हर पूर्वांचली सोचता हैं ? आइए-पूर्वांचली जनमानस के बीच चलते हैं ?


चन्द्र भूषण मिश्र "कौशिक"


"एक तरफ छोटे राज्यों को लेकर जनमानस की मांग और दूसरी तरफ छोटे राज्य के पक्षधर सरकार फिर भी पूर्वांचल के हक में कोई सकारात्मक पहल को लेकर सरकार के बीच कोई हलचल न होना सरकार के तरफ से उपेक्षा जारी रखने का ही तो संकेत हैं ।
मेरे मन में यह सवाल इस लिए आता हैं क्यों की आज भी सरकार की तरफ से प्राथमिक चिकित्सा का ही दौर चल रहा  हैं जब की पूर्वांचल की बदहालीयत की विकृति अब स्थायी समाधान की जरूरतों वाली  स्थिति के आखरी दौर पर चल रही हैं वर्ना यहा के जनमानस की  हालत आने वाले कल में  कितनी  विकृत और  विकराल  होगी इसकी परिकल्पना सड़क पर लौटते भागते मरते रोते सिसकते आज से जोड़ कल के भयावह सचं  की परिकल्पना में देखा जा सकता हैं ।
जब मांग और पूर्ति में असमानता बढ़ती रहें और उसके निराकरण में लगे होने वाले तंत्र निष्क्रिय बने रहे तो यह सवाल करना गलत न होगा की क्या वर्तमान सरकार भी पूर्वांचल राज्य विरोध समझ की ही सरकार हैं या यहा की जनता ही इसके लिए जिम्मेदार हैं ..
जब पूर्वांचल के विकास के मौलिक जरूरतों पर नजर पड़ती हैं तो समझ आता हैं पूर्वांचल विकास के इस दौर में बीते समय की पीड़ाओं के साथ आज भी चलने के नाम पर सिर्फ रेंग रहा हैं । इस स्थिति के लिए सिर्फ सरकार ही जिम्मेदार नहीं हैं यहा की जनता भी हैं क्यों की अपनी मांग पर यह न तो मुखर हो पा रही न एक जुट ही ----
इसके पीछे का कारण हैं पूर्वांचल की जरूरतों को राजनैतिक तौर पर  इतना निचोड़ कर रख दिया गया  हैं की वह  प्राथमिक उपचार को ही समस्या का समाधान समझने लगी हैं ."
साधारण पूर्वांचली समझता हैं ---सरकार पूर्वांचल विरोधी कैसे वह तो समय समय पर  पूर्वांचलहीत पर अपनी  बात रखते ही  हैं ,पूर्वांचल और पूर्वांचलीओं की  चिंता करते ही  हैं यहा के क्षेत्रों का राजनैतिक उपयोग भी अच्छे तरह से हो ही रहा  हैं इससे ज्यादा सरकार आखिर करे भी तो क्या करे ?
पढ़ा लिखा परदेश ,परप्रान्त में रहने वाला पूर्वांचली समझता हैं ---वर्तमान सरकार ने जितना किया वो कम नहीं  देश की समस्याओं से ऊपर पूर्वांचल के लोग तो नहीं हैं देश में रोजगार होगा तो हम सभी को भी रोजगार मिलेगा देश के हर एक विकास का हमें भी तो लाभ मिलेगा उत्तरप्रदेश एक बड़ा राज्य हैं यहा सबको शिक्षा ,चिकित्सा रोजगार उपलब्ध कराना आसान तो नहीं,ऊपर से यहां के ज्यादातर लोग पर क्षेत्रों में सेटल हैं 
हमारे यहां की न्यायव्यवस्था ,रोजगार उधोग अभी अच्छी नहीं इस कारण ही पूर्वांचल अन्य की तुलना में पिछड़ा हैं इसके लिए कोई और जिम्मेदार कैसे ?
पूर्वांचली किसान समझता हैं --बेशक हमारे जमीन उपजाऊ और उन्नत कृषि योग्य हैं पर किसानी घाटे का सौदा हैं इससे अच्छा वो लोग हैं जो प्रवासी बन कमा खा रहे अपने बाल बच्चों को पढ़ा लिखा रहे वाद विवाद जमीन विवाद गांव घर की समस्याओं से दूर तो हैं ।
फिर हम पंजाब की तरह उन्नत खेती कैसे कर सकते हैं इसके लिए विकास का इंतजार करना होगा हमें बेहतर विकल्प की ओर बढ़ना होगा इतना समय किसके पास हैं ! सरकार का काम हैं विकास करना जब विकास होगा तो देखा जायेगा ।
गांव घर से पैतृक रिश्ता रखने वाले समझते हैं :--क्या पूर्वांचल का गांव ही दुखी हैं सभी जगह के लोग दुखी हैं गांव और शहर में तुलना ही क्या हैं ? गांव तो गांव हैं वो शहर तो नहीं हो सकता फिर गांव में सर फोड़ने से अच्छा हैं शहर में रहा जाए अपनी जरूरतों के अनुरूप  कोई शहर ही चुन लिया जाय रही  पैतृक संपत्ति  की बात तो उसे  तब तक बचाये रखा जाय जब तक की गांव से जुड़ती बाप दादा की स्मृति के जुड़े रहने का सवाल हैं 
उस समय तक बदलते  समय के साथ इसकी कीमतें भी बढ़ेगी जिसका फायदा होगा इसे बेच शहर बसाने में थोड़ी और  मदद ही मिलेगी ।
पढ़े लिखे शहरी अति बौद्धिक सोचते हैं :--पूर्वांचल को अगर राज्य बना भी दिया गया तो मुख्यमंत्री पद बढ़ जायेगा नेताओं की जमात बढ़ जायेगी देश पर एक और राज्य का बोझ बढ़ जायेगा । माफिया और बाहुबली पूर्वांचल को अपनी चपेट में ले लेंगे आदि
जो पूर्वांचली अभी भी राज्य मांग में उलझे हैं वो विभाजनकारी सोच के कुंठा से जुड़े हैं जब की अब विश्व खुला हैं विकास की राह देने के लिए ---
इनका मानना हैं विश्व बढ़ेगा तो पूर्वांचल का विकास स्वतः हो जायेगा ।
हो सकता हैं आपके मन में भी कुछ इससे जुड़ती सवाल   हो या इसके जैसा कोई और समझ !
पर मेरा कहना हैं सिर्फ एक पक्ष की समझ और सोच के कारण हमें अपने सोच समझ को ख़ारिज कर चुपचाप बैठ यह इंतजार नही करना चाहिए की  जो हो  रहा या जो होगा उसका इंतजार ही आखरी विकल्प हैं बल्कि  हमें अपनी बात अपनी समझ पर और  सक्रियता बढ़ाने की जरुरत हैं ताकि  सरकारी  प्रचार तंत्र के  विकास व उसके ज्ञान के बसिभूत होने वाले इस भ्रम में फसने वाले पूर्वांचलीयों को भी  सच समझाया और दिखाया जा सके । क्यों की  राजनैतिक उपयोग उपभोग के  प्रचार तंत्र   आपको कभी नही बतायेगे की 
  बड़ा राज्य का हिस्सा होना कोई आखरी सत्य नहीं इसे सवैधानिक अधिकरों से बदला जा सकता हैं और ऐसा पहली बार नही होगा संसद पटल पर ऐसे निर्णय के कारण ही उत्तराखंड ,झारखण्ड ,छतीसगढ़ ,तेलंगाना जैसे तमाम राज्य बनाये गए हैं और विकास पथ पर बढ़ाएं गये हैं । 
इसके लिए हमें अपने पक्ष को भी लोकार्पित करना होगा 
वर्तमान परिवेश में बड़ा राज्य विकास की दृष्टि से कोई सौभाग्य नही बल्कि एक दुर्भाग्य मात्र हैं ।
हमारी जमीन का राजनैतिक उपयोग हमारी कमजोर मानसिकता,जातपात का विभाजन ,अपनी क्षमता को सस्ते में बर्बाद करने की मूर्खता मात्र हैं यह न तो कोई सम्मान हैं न कोई समझदारी बस हम सब की कमजोरी का दोहन मात्र हैं ।
कोई राज्य हमारे श्रम शक्ति हमारी ऊर्जा ,हमारे कार्य कौशल का कद्र दान  नही बल्कि हम सब उनके उत्पादकता के खाद पानी मात्र हैं जो अपनी जरूरतों के लिए हमें उपयोग करते हैं आगे भी जरूरत ख़त्म होते ही वो हमें अपमानित भी करते रहेंगे और प्रताड़ित भी --
आपके पूर्वांचल राज्य मांग पर आपको राजनैतिक ,सामाजिक,आर्थिक,व्यवहारिक,सांस्कृतिक    हवाला दे डराने वाले आपको भरमाने वाले आपको समझाने वाले वास्तव में आपके  हितैसी नही बल्कि आपके विकास संभावनाओं,आपके अवसरों ,आपके उद्यमों आपके राजनैतिक ,सामाजिक,व्यवहारिक,आर्थिक ,सांस्कृतिक संभावनाओं को लूटने और दोहन करने वाले लोग हैं जो कभी नही चाहेंगे कि आप अपना हक समझे उसे मांगे उसके लिए जिद्द करे क्यों की वो आपको आपके अवसरों ,आपके विकास को लूट कर ही आगे हैं और आप अपने अधिकारों से उदासीन बने रहने के कारण ही उपेक्षित और अपमानित   ।।



लेखक पूर्वांचल राज्य जनमोर्चा के राष्ट्रीय संरक्षक हैं


 


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