कोरोना का डर

 



कभी सोचा न था,
समझा न था,
आयेंगे ऐसे दिन।
कोरोना के आने से,
पड़ेगी पाँव में बेड़ी।
मुश्किल हुआ अपनों से मिलना,
न तो शहर ही जा सके,
न ही अपने गाँव।
स्वच्छन्द परिंदे विचरण करते,
जीव जंगल मे घूमे,
खेतों में नाचे मोर।
और इंसान,
घरों में हो गए हैं कैद,
बच्चे, बूढ़े और जवान।
हो गई है सड़कें खाली,
गली मोहल्ले हो गए सुनसान।
बीमार न हो इंसान,
सूने हो जाये श्मशान।
घर से निकले बाहर तो,
हर शक़्स कोरोना लगता है।
वहीं रुक जाते कदम मेरे,
कोरोना के डर से फिर तो,
घर ही चल देते है।


डॉ संगीता पांडेय"संगिनी"
(स्वरचित)कन्नौज


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