ग़ज़ल


रात लगती है मुझे दिन के उजालों की तरह 
ज़िन्दगी उलझी रही बीते सवालों की तरह 


पास आए जो कभी मैंने हक़ीक़त ही कहा 
आँख भरती यूँ रही गुज़रे विसालों की तरह 


चाह साहिल की दुआ करते रवानी में सभी 
बात लहरों की भवर उठते ख़्यालों की तरह 


जाम आशिक़ को पिलाया तो पिलाया ही किए 
इश्क़ में डूबे हुए भूखे निवालो की तरह 


हर सितम मैंने सहा तेरी मुहब्बत में सनम 
चाक करते है ग़ज़ल उजड़ी दीवालों की तरह 


ग़ज़ल सिद्दीकी


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