भगवानदीन आर्य कन्या डिग्री कॉलेज में संस्कृत नाटक व्याख्यान हुआ


लखीमपुर खीरी ।भगवान दीन आर्यकन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय में संस्कृत संस्थान लखनऊ के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित एक महीने तक चलने वाली संस्कृत नाट्य कार्यशाला के अन्तर्गत सोमवार को विशिष्ट व्याख्यान का आयोजन किया गया। अतिथि वक्ता के रूप में मैनपुरी से "एकरसानन्द महाविद्यालय" के संस्कृत विभाग की एसो ० प्रो० डॉ ० कल्पना द्विवेदी  जी ने छात्राओं को अपने वक्तव्य से लाभान्वित किया।
 कार्यक्रम की अध्यक्षता प्राचार्य डॉ० सुरचना त्रिवेदी ने की उन्होंने कहा कि संस्कृत की प्रासंगिकता प्राचीन काल से लेकर आज भी बनी हुई है, और हमेशा बनी रहेगी। संस्कृत पूर्ण वैज्ञानिक भाषा है, यही वजह है कि उसके प्राचीन ग्रंथ नए सूत्रों की रचना का मूल है। कार्यक्रम की सह संयोजिका संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ गीता शुक्ला ने डॉ कल्पना के वक्तव्य का महत्व बताते हुए छात्राओं को उसे अपने अभिनय में चरितार्थ करने की प्रेरणा दी। अतिथि वक्ता डॉ ० कल्पना द्विवेदी ने अपने वक्तव्य में "भरत मुनि प्रणीत नाट्यशास्त्र में वर्णित चतुर्विध अभिनय (आंगिक, वाचिक, सात्विक, आहार्य)" विषय पर विस्तार से जानकारी दी।
 उन्होंने बताया कि शरीर के किस अंग को किस तरह से मोड़ कर, भंग कर विभिन्न भावों का प्रतिपादन किया जा सकता है। वक्ता द्वारा शरीर के लगभग सभी अंगों से प्रदर्शित मुद्राओं का नाम सहित उल्लेख करते हुए उनका भाव बताया गया। फेसबुक तथा वर्तमान जीवन में प्रयुक्त लाइक और शुभकामना हेतु प्रयुक्त मुद्रा को नाट्यशास्त्र में अंगुष्ठेन मुद्रा नाम से उल्लेखित किया गया है। डॉ ० कल्पना द्विवेदी के चालीस से ज्यादा शोधपत्र प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी दो पुस्तकें बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में आधुनिक संस्कृत नाटक (2011) तथा पुराण वैभवम (2014) प्रकाशित हो चुकी है। इन्होंने कई पत्र - पत्रिकाओं का भी संपादन किया गया है। संचालन कार्य मीना कुमारी ने किया।  कार्यक्रम में नाट्य कार्यशाला के प्रशिक्षक डॉ ० ओमकार नारायण दुबे, प्रशिक्षु शाश्वत अभिषेक मिश्र, शिवा अवस्थी, अंशू, पूजा बाजपेई, सुषमा, मृणालिनी, भावना, शालिनी, शिवा देवी, प्रभा देवी, रूबी, शिवांगी बाजपेई, शांति, साधना रस्तोगी, काजल वर्मा, अंजली कुमारी, साक्षी, उत्कर्ष अवस्थी, पीयूष अवस्थी आदि उपस्थित रहे।


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