संस्मरण : एक अविस्मरणीय मुलाकात 

 



आभासी दुनिया विविध वर्णी है।अगर यहाँ नकारात्मक सोच और ऊर्जा से परिपूर्ण लोग हैं तो ऐसे लोगों का भी अभाव नहीं जो रचनात्मकता और सकारात्मकता से ओत-प्रोत भी हैं। फेसबुक पर मेरी मुलाकात एक ऐसे ही व्यक्तित्व से हुई जो अपनी रचनात्मकता और बेबाक लेखन के लिए जाने जाते हैं। सामाजिक घटनाओं पर पैनी नज़र रखना और फिर उन सर बेफिक्र लिखना आपकी जीवनचर्या का अभिन्न अंग है। फेसबुक पर 'साहित्यिक पंडानामा' नाम से आपने लेखन की एक श्रृंखला चला रखी है।जिसमें आप प्रतिदिन साहित्य से जुड़े एक नवीन मुद्दे पर झकझोर देने वाली लेखन-शैली से साहित्यिक मठाधीशों की बखिया उधेड़ते रहते हैं। कल 23/02/2020 को जब मैं अपने गृह-जनपद सीतापुर( उ.प्र.) गया तो आपसे मिलने की इच्छा प्रकट की और मोबाइल नंबर माँगा तो वे सहर्ष तैयार हो गए।शाम को जब मैं उनके घर पहुँचा तो वे गेट पर हाथ जोड़े खड़े मिले। एक सहज ,सरल और सौम्य व्यक्तित्त्व के धनी।आपका नाम है श्री भूपेन्द्र दीक्षित।इस अवसर पर मुझे आपकी धर्मपत्नी डाॅ ज्ञानवती दीक्षित जो कि लेखिका होने के साथ-साथ सीतापुर में ही एक इंटर कॉलेज में प्रधानाचार्य हैं, से भी भेंट का सुअवसर प्राप्त हुआ।यह घटनाक्रम बिल्कुल ऐसा ही था जैसे आजकल कंपनियाँ अपने उत्पाद बेचते समय एक के साथ एक फ्री की स्कीम चलाती हैं।डाॅ ज्ञानवती दीक्षित की आत्मीयता और  हँसमुख औपचारिकता से रहित स्वभाव ने इस बात का अहसास ही नहीं होने दिया कि आप दोनों से पहली बार मुलाकात हो रही है।आप दोनों का आतिथ्य अभिभूत कर देने वाला था। 
इस मुलाकात के दौरान क्षेत्रीय और साहित्यिक अनेक मुद्दों पर चर्चा हुई। अवधी के स्वनामधन्य वरेण्य कवि डाॅ मधुप का जिक्र भी आया, जिनसे जीवन में एक बार भेंट का अवसर मुझे प्राप्त हुआ था।उनकी एक धूमिल छवि मस्तिष्क में घूम गई।भारत इंटर कॉलेज, कोरौना,जहाँ मैंने कक्षा 9 से 12 तक शिक्षा ग्रहण की है, के यशस्वी प्राचार्य स्व रामेश्वर दयाल दीक्षित  का भी स्मरण हुआ।उनके नाम के साथ ही मुझे वह समय याद आ गया ,जब उन्होंने मुझे कालेज में बुलाकर लगभग एक घंटा यह समझाया था " कि मैं तो सोचता था कि मेरा पढ़ाया हुआ विद्यार्थी पी-एच. डी.करेगा, डी.लिट् करेगा और तुम एल.टी. कर रहे हो।" मैं चुपचाप सिर झुकाए उनकी बातें सुनता रहा था और उन्हें प्रणाम करके इस संकल्प के साथ घर लौटा था कि मुझे गुरुदेव की इस इच्छा का सम्मान अवश्य करना है।आज अगर मेरे नाम के साथ डाॅ. लगा हुआ है तो उसका श्रेय गुरुदेव रामेश्वर दयाल दीक्षित को ही जाता है।
श्री भूपेन्द्र दीक्षित जी को बातचीत के क्रम में जब यह ज्ञात हुआ  कि मैंने लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ाई की है तो चर्चा का रुख उन तमाम गुरुजनों की तरफ मुड़ गया जिन्होंने जाने-अनजाने मेरे व्यक्तित्व को सजाने सँवारने में अपना योगदान दिया है।डाॅ प्रेम शंकर तिवारी जिन्होंने मुझे एम.ए. उत्तरार्द्ध में पढ़ाया है और जो मेरे शोध निर्देशक भी रहे हैं, से भी भूपेंद्र दीक्षित जी परिचित थे। उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं की भी चर्चा हुई।बातचीत करते हुए अनायास ही मन अतीत की परिक्रमा करने लगा।
डाॅ ज्ञानवती दीक्षित ने मुझे अपनी सद्यः प्रकाशित समीक्षात्मक शोध कृति 'अवधी प्रबंध धारा' भेंट की ,जो कि हिंदी साहित्य की एक अनमोल धरोहर है,ऐसा मेरा विश्वास है।इस कृति को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि इसे तैयार करने में अथक श्रम किया गया है।इस ग्रंथ में अवधी प्रबंध काव्यों का विस्तृत विवेचनात्मक विवरण प्रस्तुत किया गया है।अंत में आप दोनों साहित्यकार दंपति के साथ मैंने  चित्र भी खिंचवाए।
आज जब व्यक्ति अपने ड्राइंग रूम में बैठे-बैठे ही अलविदा कह देता है या फिर बहुत ज्यादा ड्राइंग रूम से निकलकर अपने गेट पर खड़े होकर हाथ जोड़ लेता है ऐसे समय में  श्री भूपेन्द्र दीक्षित जी मुझे अपने घर से लगभग 200 मीटर दूर तक,जहाँ मेरी गाड़ी खड़ी थी,छोड़ने आए।श्री दीक्षित जी के इस शिष्टाचार को देखकर लगा कि अभी तक हमारी संस्कृति और परंपरा जीवित हैं।श्री भूपेंद्र दीक्षित जी घर से विदा होते समय मेरी स्थिति ठीक वैसी ही थी जैसी कि अयोध्या से भरत जी से लंका के लिए विदा लेते समय हनुमान जी की थी।
भरत बाहुबल शील गुन,प्रभुपद प्रीति अपार।
मनमहुँ जात सराहत,पुनि पुनि पवन कुमार।।
डाॅ बिपिन पाण्डेय 
रुड़की।


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