राम का वन गमन

 




ज्ञानदीप मन में जलाये,
उद्विग्न मन पर विजय पाये ।
नेह के बन्धन ....सजीले ,
कर्मपथ पर पग   बढाये ।।
स्वयं में क्यों जल रहे हो,प्रिय वनगमन क्यों कर रहे हो ।।

नेह का अवदान करके,
पग धूलि शिरोधार्य करके।
जीवन रण में लेकर शपथ
कुमात क्यो अनुवरण करते ।
शिथिल गात करके मेरे प्रिय क्यों स्वयं को मथ रहे हो ।।

स्वयं में क्यों दह रहे हो,प्रिय वनगमन क्यों कर रहे हो।।


उस वचन को न मान जीवन,
कष्ट जो देगें......आजीवन।
संसार का हित साधने को,
कंठ धरते क्यों संजीवन ।
मात की वचनों की खातिर क्यों दीपशिखा से दह  रहे हो ।

स्वयं में क्यों जल रहे हो प्रिय वनगमन क्यों कर रहे हो।

नहीं तृप्त तन-मन हुआ है,
स्मृति का बस तेरी धुंआ है।
विमुख कैसे तुझसे हो लूं,
आजन्म तू मेरा हुआ है।।
रक्तरंजित मनोभूमि पर वत्स क्यों अकेले चल रहे हो ।।

स्वयं में क्यों दह रहे हो,प्रिय वनगमन क्यों कर रहे हो ।।

अवसान समय प्रिय संग रहना,
जीत कहना ,हां हार कहना ।
निर्विकार ओजस्वी तुम प्रिय,
समर्पण जीवन का सहना ।
कर्महित बलिदान होकर मुझको क्यों निर्बल कर रहे हो ।।

स्वयं में क्यों दह रहे हो,प्रिय वनगमन क्यों कर रहे हो।।

ज्ञात है अंतिम समय पर,
नहीं तुम्हारा मुख मिलेगा।
जीव चराचर इस जगत में,
एकान्त पथ पर ही बढ़ेगा।।
पथरीले अन्तिम सफर में सुत 
अभी से विलग क्यों कर रहे हो।।

स्वयं में क्यों दह रहे हो,प्रिय वनगमन क्यों कर रहे हो ।।

सर्वाधिकार सुरक्षित
रंजना शर्मा ✍️
22/2/2020


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