महाशिवरात्रि के शुभ अवसर पर ऋषि पाराशर धाम में आस्था और भक्ति का उमड़ा जनसैलाब

 



संवाददाता मोहन लाल चौहान 


गोण्डा।जिले के तहसील क्षेत्र तरबगंज के अंतर्गत परास पट्टी मझवार के ऋषि पराशर धाम में महाशिवरात्रि के शुभ अवसर पर भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिली। 
हर वर्ष महाशिवरात्रि के अवसर पर लगने वाले मेले में दूरदराज के क्षेत्रों से आने वाले भक्त ऋषि पाराशर का दर्शन कर हृदय में असीम शांति का अनुभव करते हैं।
ऋषि पाराशर की महिमा का वर्णन पुराणों में भी वर्णित है और परास गांव के ही विद्वान संत ने भी पाराशर चालीसा में ऋषि पाराशर की महिमा का वर्णन अनुपम ढंग से किया है।
प्राप्त तथ्यों एवं साक्ष्यों के आधार पर ऋषि पाराशर का संक्षिप्त परिचय कुछ इस प्रकार है।
यह वही पाराशर ऋषि हैं जिनके पुत्र महर्षि वेदव्यास ने महाभारत की रचना की थी।
भारतीय ज्योतिष के प्रवर्तकों में महर्षि पराशर अग्रगण्य हैं। महर्षि प्रोक्तं ग्रंथों में केवल इन्ही का सम्पूर्ण ग्रंथ 'बृहत्पराशरहोराशास्त्र' नाम से उपलब्ध हैं। अन्य प्रवर्तक ऋषियों के वचन तो इतस्ततः मिलते हैं, लेकिन किसी सम्पूर्ण ग्रंथ के अद्यावधि दर्शन नही होते हैं। यह बात पराशर  के मत की सर्व व्यापकता व सार्वभौमिकता का एक पुष्कल प्रमाण है। 


'पराशरहोराशास्त्र' की गुणग्रहिता व सम्पूर्णता के कारण ही इनकी यह रचना सर्वत्र प्रचलित है।


* ज्योतिष शास्त्र के सभी ग्रंथों पर यदि दृष्टि डाली जाये तो अनुभव होता है कि परवर्ती आचार्यों के मंतव्यों की मूल भित्ति पराशरीय विचार ही है।                      
* पराशर सम्प्रदाय या पराशरीय विचारधारा, विचारों की उस गंगा के समान है, जो समस्त भारत भूमि को अपने अमृत से आप्लावित करती हुई अपनी चरम गति या मंजिल पर पहुंचती है और अवान्तर अनेक विचारधारा रूपी नदियों को भी अपने भीतर समेटती चलती है। अतः 'पराशर मत्त' गंगानद है तो अन्य विचारधाराएं या मत्त नदियाँ ही है। यह एक अविच्छिन्न रूप से बहने वाली, सदानीरा नदी है। इस दृष्टि से देखने पर महर्षि पराशर का स्थान जैमिनी मुनि से ऊँचा ही सिद्ध होता है। जैमिनीय मत्त के पोषण की परंपरा हमें अवान्तर काल में अट्टू रूप में नही मिलती है।


जैमिनीय मत्त की सभी बातें पराशर सम्प्रदाय में सर्वतोभावेन समाहित हो गयी है, इसका आभास पराशरहोराशास्त्र को देखने से मिल जाता है।


* वराहमिहिर जैसे आचार्य भी पराशर के सिद्धांतों के सामने नतमस्तक हैं। वे अपने ग्रंथों में पराशर मत्त का उल्लेख करके उसका अंगीकरण करते हैं। अतः पराशर सम्प्रदाय सम्पूर्ण भारत में चतुर्दिक, पुष्पित व पल्लवित होता रहा है तथा ज्योतिष के विषय में उनके द्वारा रचित 'बृहदपराशरहोराशास्त्र' अंतिम निर्णायक ग्रंथ माना जाता है। पराशर, 'फलित ज्योतिष'  के आधार स्तंभ हैं इसमें कोई संदेह नही है। 
अर्थशास्त्र में पराशर का नामोल्लेख पाया जाता है। गरुड़ पुराण में पराशरस्मृति के श्लोकों का संग्रह किया गया है।


* बृहदारण्यकोपनिषद व तैत्तिरीयारण्यक में व्यास व पराशर के नाम आते हैं। 


* यास्क ने अपने '#निरुक्त' में पराशर के मूल का भी उल्लेख किया है। ये कृष्णद्वैपायन व्यास के पिता थे तथा इनके पिता का नाम 'शक्ति' था। वराह ने पराशर को शक्तिपुत्र या शक्ति पूर्व कहा है।


* अग्निपुराण में स्पष्टतया इन्हें शक्ति का पुत्र ही कहा है। यही पराशर मत्स्यगंधा सत्यवती पर मोहित हुए थे तथा सत्यवती के गर्भ से पराशर पुत्र कृष्णद्वैपायन व्यास उत्पन्न हुए थे, यह सुविदित ही है।


* इन्ही पराशर ने कलियुग में व्यवस्था बनाये रखने के लिए 'पराशरस्मृति' या 'द्वादशाध्यायी' धर्मसंहिता की रचना की थी।
परास पट्टी मझवार में स्थित पाराशर ऋषि के दर्शन मात्र से ही संपूर्ण मनोकामनाएं पूर्ण एवं फलीभूत होती हैं।
वहीं पाराशर ऋषि की पौराणिकता को देखते हुए पर्यटन विभाग भी अब इसे पर्यटन स्थल घोषित करने के काम में लगा हुआ है।


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