क्या?सहमत हैं


वोट बैंक की नीति निराली-
हत्याओं पर निंदा खाली-
शत्रु के आगे शान्ति की थाली-
यही रही अब तक रखवाली-


लोकतंत्र में गाली-गाली-
झेल रहा है देश जुगाली-
देश के अंदर बड़े मवाली-
झेलो झेलो झेलो खाली-


सदा जवानों को ही खोया-
घड़ियाली आंसू बस रोया-
गद्दारों को गले लगाया-
वोट की खुश्बू उनमें पाया-


हवस लगी सत्ता की पाया-
कर्म कुकर्म ना भेद दिखाया-
जगह जगह कश्मीर बनाया-
देश एकता धूल मिलाया-


देश विखंडित करने वाले-
सदा दिखे हैं भोले-भाले-
नेता जी इनके रखवाले-
घूम रहें गलबहियां डाले-


टुकड़े भारत होंगे बोले-
फेंक रहे जो बोल के गोले-
मीडिया के बनते मुंह बोले-
राजनीति में वोट के झोले-


बौद्धिक वर्ग के आस यही हैं-
राजनीति के खास यही हैं-
देश एकता बांस यही हैं-
वर्ग जाति के सांस यही हैं-


आखिर देश कहाँ पँहुचाये?
लोकतंत्र क्यों यही समाये?
जाति-जाति नेता उपजाये-
घृणा आपसी क्यों अपनाये?


वाद वाद को गले लगाये-
क्षेत्रवाद को श्रेष्ठ बनाये-
बहुलवाद को गर्त मिलाये-
राष्ट्रवाद ठेंगा दिखलाये।


अभी समय है सम्भलो यारों-
खंडित सोच को कुचलो यारों-
समता को अपनाओ यारों-
वाद वाद ठुकराओ यारों-


संविधान जब सबका रक्षक-
फिर क्यों वाद के इतने रक्षक?
वादी ही तो देश के तक्षक-
यही एकता के हैं भक्षक।


तुष्टिकरण से देश बचाओ-
यह गद्दार इन्हें ठुकराओ-
राष्ट्रवाद आधार बनाओ-
लोकतंत्र को पुष्ट बनाओ।।


पीड़ित मन मेरा यह गाई-
देश की हालत है सच्चाई-
देश प्रेम संवृद्धि बड़ाई-
अब चुनाव मुद्दा हो भाई-


अब अवसर जागो प्रिय भाई-
समय चूँकि पुनि का पछताई।
लिख-लिखकर हम धर्म निभाईं-
देश धर्म गाईं प्रभुताई।।



राकेश कुमार पाण्डेय
सादात,गाजीपुर


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