शान्ति मार्च नही वध करो


हरण हुआ जब नारी का,
तब त्रेता में संग्राम हुआ।
नारी का सम्मान बचे,
इस हेतु रावण संहार हुआ।


द्वापर के एक राजमहल में,
हुई अपमानित नारी।
भरी सभा मे द्रुपद सुता की,
जब खींची गई साड़ी।


रक्तरंजित फिर हुई धरा,
अधर्मी सब हुए नदारद।
कुरुक्षेत्र का वह युद्ध,
कहलाया महाभारत।


राणी का मान बचाने को,
राणा ने भी संग्राम किया।
पद्मिनी का मान बचाने को,
गोरा-बादल ने संघर्ष किया।


राम, भीम, राणा, गोरा ने
दुश्मन का सीना फाड़ा है।
स्त्री पर जो हाथ उठा,
उसे धड़ से ही उखाड़ा है।


थी यही परम्परा यही नियम,
यही न्याय यही नीति।
स्त्री पर प्रतिघात करे जो,
उसे त्वरित लो जीत।


अस्मत खोती बेटियों की अब,
सड़को पर नँगी लाशें हैं।
हिंसा का उत्तर शांति मार्च,
मोमबत्ती के तमाशे हैं।


अपनी लज्जा, मान मर्यादा का,
कब तक शव उठाओगे।
कन्धे पर खुद की लाशें ले,
शान्ति मशाल जलाओगे।


वो हैं हिंसक पशु भेड़िए,
माँस नोचकर खाने वाले।
उनसे अनुनय-विनय निवेदन,
काम नही आने वाले।


बन्द करो ये शांति प्रदर्शन,
शीश उठा हुंकार भरो।
हिंसा का प्रतिउत्तर हिंसा,
मौन छोड़ चीत्कार करो।


उठो वीर बहना के प्यारे,
राखी की लाज बचाओ तुम।
भाई-दूज पर वचन दिया जो,
रक्षा का वचन निभाओ तुम।


न्याय परम्परा गौरवशाली,
भूल गए जो याद करो।
मां, माटी, स्त्री के हित में,
भेड़ियों का संहार करो।


✍ दीपक अवस्थी "बंसीधर"
        बाराबंकी, उत्तर प्रदेश


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