विनय विक्रम सिंह : साहित्यिक परिचय

 



नाम - विनय विक्रम सिंह
जन्म - २२/ १०/ १९७५
माँ का नाम:- श्रीमती श्री सिंह
पिता का नाम:- स्व श्री राम समुझ सिंह
पत्नी का नाम:- अभिलाषा विनय
जन्म स्थान - कानपुर
मूल निवास - लखनऊ
शिक्षा - बी.एफ़. ए - कला एवं शिल्प महाविद्यालय, लखनऊ।
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संप्रति नोयडा में कार्यरत

साहित्यिक सम्मान:- छन्द श्री सारस्वत सम्मान, इंद्रप्रस्थ गौरव सम्मान, ट्रू मीडिया साहित्य सम्मान, गीत श्री सम्मान, विविध मंचों द्वारा सर्वश्रेष्ठ रचनाकार, दोहाकार/मुक्तक श्री सम्मान आदि।

संकलन:- गीत सिन्दूरी हुए, काव्य त्रिपथगा (साझा) व अन्य पत्रिकाओं व समाचार पत्र में कविताएँ प्रकाशित।

🌸 कहानियाँ भी हैं, और किस्से भी हैं, 
ज़िन्दगी के रंग बेरंग हिस्से भी हैं।
करता रहता हूँ जब तब मैं इनको रफू, 
इन कतरनों के कढ़ने से ही मैं बनूँ।। 🌸

- विनय विक्रम सिंह

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🌸    नये विधान    🌸                         

अखंड गर्व धार के, गढ़ो नये विधान तुम।
प्रभात छंद गीत से, कहो कथा महान तुम।।

सजा सुभोर पावनी, वसंत माल मुक्तिका।
सुगंध शौर्य की बहे, सजा स्वभाल मृक्तिका।
नवीन धारणा गुनो, रचो नवीन वृत्तिका।
अतुल्य कण्ठ घोष से, रचो नये 'निधान तुम।
अखंड गर्व धार के, गढ़ो नये विधान तुम ।१।

प्रकाण्ड सूर्य रूप हे, नवीन धारणा गढ़ो।
पराक्रमी सुवीर हे, प्रयाण तूर्य ले बढ़ो।
अजेय अग्नि बाण हे, तुरंग वेग से कढ़ो।
कहो नहीं करो सदा, बढ़े चलो विहान तुम।
अखंड गर्व धार के, गढ़ो नये विधान तुम ।२।

विजेयता बनो लिये, सुतीक्ष्ण तेग कर्म की।
सनेह प्रेम घोल दो, सुचित्त धार धर्म की।
दया, क्षमा, सदा बहे, नदी ममत्व, मर्म की।
चुनौतियाँ अड़ें कहीं, वहीं बनो निदान तुम।
अखंड गर्व धार के, गढ़ो नये विधान तुम ।३।

उमंग श्रृंग रूप से, अनंत प्रेय वंद्य हो।
उछाह रंग रोचना, सुवंद्य राष्ट्र कंत हो।
अहो अखंड वन्दना, अभंग ओज ढंग हो।
सुशौर्य की मिसाल हो, मिटा सभी 'युधान तुम।
अखंड गर्व धार के, गढ़ो नये विधान तुम ।४।

अभूत देश राग से, प्रकंप दुष्ट त्राण हे।
अभंग तीव्र ज्योति से, घृणा तमा विनाश हे
विभोर मातु भारती, रहे तभी प्रसन्न हे।
सजो स्वदेश भाल पे, अजेय सी उड़ान तुम।
अखंड गर्व धार के, गढ़ो नये विधान तुम ।५।

- विनय विक्रम सिंह
#मनकही

'निधान- आधार। 'युधान- रिपु। शत्रु। दुश्मन।


🌸     होरी है       🌸
.        #अवधी        .

फगुनौती मनवा महकावै, सजे फाग चौताल,
अंग पतंगा अबीर उड़ावै, तन भा रंग गुलाल,
उलरैं कूदैं भाव बसंती, नाचि ताल बेताल,
नेह  प्रीत मा  रंगि मोहना, मेटै  सभै मलाल।१।
जोगीरा सा रा रा ...

रँगी चिरइया ड्वालै अँगना, चिहुँकै करे निहाल,
आभ भोरहरी चमकैं रउवाँ, घुँघटा किहे बवाल,
हुलसै अँचरा और अँगनवा, रंगन कै करताल,
जियरा भउजी भउजी गावै, ललछौं नेह रसाल।२।
जोगीरा सा रा रा ...

प्रेमु गठरिया बिनु गाँठी कै, फगुनावै हरु साल,
रुसे फलाने, तपे ढिमाके, स्वारथु कै भूचाल,
गाँवै गड़ही ताल झुराने, फइल रहे जंजाल,
फगुनहती रस रंग बूड़ि कै, ह्वै गै मालामाल।३।
जोगीरा सा रा रा ...

दिक्क बीमारी होय चौगड़ा, महुआ जइसे गाल, 
लप्पा-झप्पी, नेह झकोरे, नाते दियें सँभाल,
रंग, ढंग कै डोरी ज्वाड़ें, द्वेष भाव कंगाल, 
गलबहियहन दिवार ढहावो, आखर ढाइ सवाल।४।
जोगीरा सा रा रा ...

- विनय विक्रम सिंह
#मनकही


🇮🇳 पुलवामा #फाग 🇮🇳

बमु तें दीन्हिन फोरि पिछारी,
घेंपि गटइया रगरेन भुइँ मा,
यादि आगै महतारी,
दइया दइया सुवर ढेंकरैं,
धोती भयी मुतहारी,
बमु तें दीन्हिन फोरि पिछारी।१।

बज्जर धूरत पाकिसतानी, 
आतंकिन कै ससुरारी,
सपन चूरि करि बम्ब फटै जबु,
घुसि गै सबु हुसियारी,
बमु तें दीन्हिन फोरि पिछारी।२।

मारि बयालिस उलरै कूदै,
पीठि पै भोंकि कटारी,
आतंकिन का गोदी पालै,
मुख हाँसी उजियारी,
बमु तें दीन्हिन फोरि पिछारी।३।

देहे ताव रहि रहि म्वाछन पै,
आँखि देखावै कारी,
ग्वाड़ पसारे स्वावै ऐंठा,
बमु तैं मोच्छ उचारी,
बमु तें दीन्हिन फोरि पिछारी।४।

हाथि पसारे जग छुछुआये,
जनमन केर भिखारी,
पानी सोखि गवा काँधन का,
फिरहुँ मोच्छ पनियारी,
बमु तें दीन्हिन फोरि पिछारी।५।

नैहर मा खसमन कै क्यारी,
पचिसन हैं ससुरारी,
ऐंठि रहे दम पै ससुरारी,
नैहर "हाँ"ड़ि उघारी,
बमु तें दीन्हिन फोरि पिछारी,
फोरि दिहिन बमु मारी,
वनका फोरि दीन्ह बमु मारी।६।

- विनय विक्रम सिंह
#मनकही

उपरिलिखित समस्त रचनायें मौलिक हैं व जानकारी पूर्णतः सत्य है।


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