ग़ज़ल

 



 


  जब केहू से हिजा-गिला राखीं।
     सामने  अपना  आईना राखीं ।।


     प्रेम केहू से जन करीं अचके ।
  सोझा सब दिन,दशा-दिशा राखीं ।।


    ताली एक हाथ से ना बाजेला ।
    अपनो मन में दुआ-दया राखीं ।।


     रंग भरला के बात बा खाली ।
     पहिले ढ़ाँचा बना-बना राखीं।।


     अबकी जिनगी के बाँध टूटि सब।
     छूँछे  कहिया  ले आसरा राखीं ।।


     आज जौहर गजल के महफिल में ।
     शेर    खाँटी    नया-नया    राखीं ।।


                     (जौहर शफियाबादी)


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