बिटिया

 



नेह का दूसरा 
रूप होती है बिटिया
कोई मनोती नही मानता
इनकी ख़ातिर
काली माई को पियरी
ग्राम देवता को कड़ाही नही चढ़ती
इनके होने पर
फिर भी फल फूल जाती है
दिखने में छुईमुई सी
पर मन से 
बहुत मजबूत होती है बिटिया
बिन मांगी मुराद होकर भी
घर भर की खुशियों की ख़ातिर
कभी गंगा माँ को नारियल चुनरी चढ़ाती है
तो कभी डीह पे दिया जलाती है
भाई के लिए दूज व्रत
पति की लंबी उम्र की कामना लिए
तीज-चौथ, वटसावित्री व्रत रखती है
बेटे की राजी ख़ुशी के लिए छट्ठी माई को
बड़े जतन से मनाती, अर्घ पूजन करती है
सभी के खुशियों की कामना करती
चाहती है तो बस थोड़ा सा सम्मान
अपने वजूद के लिए
समझ सके कोई उसके मन की
सुनें उसकी भी
और यही चाहत मन में लिए
अपनो के लिए दुआएं करती
निकल पड़ती है अंतिम यात्रा को
फिर किसी बंजर जमीं पर
अनचाही फ़सल बन
बिना खाद पानी के 
एक बार फिर लहलहाने को "बिटिया"


#उमाअनिल ‌‌‌‌द्विवेदी


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